The human mind and black hole both are creative sources. Thoughts emerge from the human mind, and galaxies emerge from the black hole. “Scientific evidence suggests that every large galaxy contains a supermassive black hole at its center.” Our galaxy Milky Way has emerged from the black hole Sagittarius located at its center.

Theoretical physicist NikodemPoplawski says, “Our Universe may exist inside a black hole. This may sound strange, but it could be the best explanation of how the Universe began and what we observe today.”

We are part of Creation. An individual’s understanding of the concept of Creation is influenced by his vision.

Somebody’s idea about Creation may stay confined to ‘Nature’ or ‘Earth’ only, and somebody may think of the existence of Creation beyond the Universe.

If the Universe is the creation of unknown power, then literature is the creation of the human mind. Both are emerging from nothingness or invisible space like a black hole. We can find a similarity in the process of formation of both from the void. In this article, I am making efforts to highlight the existence of the black hole in the Universe and the human mind scientifically.

How Can We Relate The Concept Of The Black Hole To Invisible Space?

Ancient Indian yogis believed that energy stays latent in darkness and remains invisible. But it suddenly emerges from the dark and creates the Universe.

In Yogi’s words, “Energy remains latent in invisible space (shunyata), and as per its nature, it emerges and creates an oval world.” The scientists presented the opinion of the emergence of the Universe from the black hole. They stated black hole as “A region in space where the pulling force of gravity is so strong that light is not able to escape.” They also said that “Black hole cannot be seen because of the strong gravity that is pulling all of the light into the black hole’s center. However, scientists can see the effects of its strong gravity on the stars and gases around it. If a star is orbiting a certain point in space, scientists can study the star’s motion to find out if it is orbiting a black hole.”

black hole in human mind

We can relate the concept of black holes given by the scientists to ancient Indian Yogi’s idea about the existence of the latent energy in the invisible space that created the Universe. In light of these statements, we can relate the black hole to that latent and hidden space stated by yogis where the spin of energy exists. This spinning energy comes out of the black hole and creates a galaxy at some point in time. The following statement of NikodemPoplawski can support this point:

“Torsion, therefore, provides a theoretical foundation for a scenario in which the interior of every black hole becomes a new universe.”

A general inference could be drawn by the statements mentioned above that, for creating something new, there must be energy in invisible space.

How To Feel The Existence Of A Black Hole In The Human Mind?

Like the Universe, a black hole can exist in the human mind. It can be sensed as the feeling of absence of something in life. The emergence of such feelings in the human mind motivates to create a new reality in life, and the seed of Willpower gets planted in nothingness or invisible space.

Then the thoughts and efforts of an individual orbit the Will, and at a point in time in space, an individual’s actions create a new reality, just like a galaxy that emerges from a black hole.

We are familiar with the term ‘System. ‘Thermodynamics, a branch of physics that deals with the relationships between heat and other forms of energy, define sit as a certain quantity of matter or space understudy or analysis.

As the human body exchanges matter and energy with the environment, it can be selected as a system for thermodynamic study. A black hole can get created in the human mind in a body system.

The spinning energy of thoughts and effort can hold energy in the black hole like a strong gravitational pull. It can enhance spontaneous change in ideas and thinking processes.

This energy of black hole can resist the human mind from being influenced by external influences and can motivate to concentrate on the ‘Will’ to find ways to create a new reality.

This state of the human mind is similar to the isolated type system. “In the natural sciences an isolated system is a physical system without any external exchange – neither matter nor energy can enter or exit, but can only move around inside.”

How Can The Seed Of Will Power In The Black Hole Of The Human Mind Be A Boon For Us?

, “As energy can be converted into mass, the immensely high gravitational energy in this extremely dense state would cause an intense production of particles, greatly increasing the mass inside the black hole.”

Atoms create everything in the Universe. The law responsible for the transformation of energy to particles in the black hole may also be responsible for creating a new reality by creating atoms from the energy of Willpower placed in the black hole of the human mind.

Knowledge of having a black hole within us like the Universe is eventually becoming conscious about our potentials. Education can make new generations aware of their potential.

Widening the boundaries of science and setting on the journey from known to unknown and visible to invisible with a liberal scientific approach can bring new light to the world.

गर्मियों की छुट्टियों से पहले मिले फुर्सत के दिन बोनस में मिले पलों की तरह थे। होली के रंग में डूबे मौसम में हमने चित्तरंजन शहर में समय बिताने का फैसला किया। पाँच दिनों का अवकाश और पहाड़ी या सागर के किनारे बसे शहरों को न चुनकर हमने चित्तरंजन को ही क्यों चुना? साथियों का यह सवाल वाजिब था। दरअसल शांतनु का बचपन इस शहर में बीता था। विवाह के बाद से आज तक चित्तरंजन में बिताए पलों की बातें उसकी यादों में सुनहरे अक्षरों में चमकते थे। इतना ही नहीं संयोग से कोई चित्तरंजन का अंजान इंसान भी मिल जाता तो इस शहर से जुड़ी खुशनुमा यादें उनके बीच सेतु बन जाती थीं। भले ही इंटरनेट में यह शहर रेल इंजन बनाने के कारखाने के लिए परिचित दिखा, लेकिन इस शहर की हवाओं में कुछ तो ऐसी बात थी कि यहाँ की बातें यहाँ वक्त गुजारने वाले लोगों की खुशनुमा यादों का हिस्सा बन जाती हैं। इस शहर की कशिश, उसकी संस्कृति और प्राकृतिक अनोखेपन की बातें मैंने सुनी थीं और अब उसे महसूस करना चाहती थी। तभी अवकाश मिलते ही होली के दिन हम चित्तरंजन के लिए रवाना हुए। शांतनु में अपने बचपन की खोई यादों को ताज़ा करने की चाहत थी तो मुझमे इस शहर की कशिश को महसूस करने की चाहत। आठ वर्ष की बिटिया राशि तो पढ़ाई से पाँच दिनों की आज़ादी के खयाल से ही खुश थी। सन 1950 से पहले यहाँ दुर्गादीहि गाँव हुआ करता था। यहाँ के आदिवासियों को हटाकर भाप इंजिन बनाने वाली पहली फैक्ट्री चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स और इसमें कार्यरत लोगों के लिए चित्तरंजन शहर बना। स्वतन्त्रता सेनानी चित्तरंजन दास के नाम पर बना यह शहर दीवार से घिरा है। यह दीवार इस शहर की सीमारेखा निर्धारित करती है। इस शहर में अस्पताल, विद्यालय, महाविद्यालय, बाज़ार, सिनेमा घर, लाइब्रेरी और मनोरंजन के तमाम साधन हासिल हैं। यहाँ नदी, पहाड़, बांध, बाग-बागीचे एक साथ देखे जा सकते हैं। रूखेपन से मुक्त इस योजनाबद्ध शहर की बातें ही मुझमें इसे देखने की चाहत को बढ़ा चुकी थीं।

कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ़्टी श्री पी0के0 आचार्या के सौजन्य से रेलवे अफसर क्लब की मेज़बानी में हम चित्तरंजन स्टेशन से इस शहर की ओर रवाना हुये। चित्तरंजन के प्रवेश द्वार पर बना भाप इंजन का मॉडल ही इस बात का एहसास दिला रहा था कि द्वार के उस पार एक खूबसूरत सजीला शहर बसता है। शहर के चौड़े काले चिकने रास्तों के साथ ही यहाँ की हरीतिमा से निखरे प्राकृतिक सौन्दर्य ने सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा। अफसर क्लब से होती हुई हमारी गाड़ी चित्तरंजन भवन कैम्पस पर आकार रुकी। कैम्पस का चौड़ा पक्का दोनों ओर सफ़ेद बार्डर खिंचा रास्ता, एक ही आकार और कद में छटे देवदारू के पेड़, विशाल हरा लॉन उसके चारों ओर गेरू से रंगे ईंटों के बार्डर के बीच लाल मिट्टी का रास्ता और ईंटों के बगल में एक पंक्ति में लगे गेंदे के फूल से लदे पौधे प्रकृति को निरखने और खामोशी को महसूस करने का निमंत्रण दे रहे थे।

दोनों ओर गेरू और चूने से रंगे तनों वाले पेड़ों के बीच से गुजरे रास्तों पर सुबह की सैर का आनंद ही कुछ और था। ओवल ग्राउंड, देशबंधु स्टेडियम का चौक पार करके हम हिल टॉप की ओर बढ़ रहे थे। सामने बसंती इंस्टीट्यूट था। जहाँ सिनेमाघर और लाइब्रेरी एक साथ थे। यहाँ होने वाले विज्ञान की प्रदर्शनियों की बातें मैंने सुनी थी। इंस्टीट्यूट के बगल में ही एक मैदान में बड़े-बड़े यूकेलिप्टस के पेड़ दिखे। यह ईस्ट मार्केट का इलाका था। जहाँ का रास्ता कुछ हद तक खुरदरा था। इस रास्ते से हिल टॉप की ओर बढ़ते हुये फूलों से सजी हुई एक जगह दिखी। यह होर्टिकल्चर सुपरिंटेंडेंट का कार्यालय था। शांतनु की स्मृति में आज भी इस जगह पर कभी आयोजित होने वाली फूल और सब्जियों की प्रदर्शनियों के बिम्ब ताज़ा थे। उन प्रदर्शनियों से बागवानी को प्रेरित करने की संस्कृति को बढ़ावा मिलता था। अपने आँगन को पौधों से खूबसूरती से सजाने वालों को पुरस्कृत करने की रीत लोगों के सौंदर्यबोध को बढ़ावा देती थी। आज उस संस्कृति के क्षय की खबर ने शांतनू को चोट पहुंचाई। लेकिन मेरे मन के कोरे कागज में चित्तरंजन के वर्तमान की जो छवि बन रही थी उसमें यह शहर प्राकृतिक वैभव से नवाजा हुआ ही दिख रहा था। भले ही अतीत में यह शहर और भी खूबसूरत रहा हो लेकिन आज भी यहाँ जो है वह आकर्षक है। इसी के साथ यहाँ के प्राकृतिक वैभव को बरकरार रखने वाली संस्कृति को बचाने का सवाल भी मेरे मन में उमड़ रहा था। ताकि यहाँ जो कुछ भी बचा है वह महफूज रह सके।

हिल टॉप का सौन्दर्य अनोखा है। यहाँ से पूरा चित्तरंजन शहर दिखाई देता है। सफ़ेद और लाल रंग से रंगे छोटे – बड़े पत्थर इस जगह की शोभा बढ़ा रहे थे। पहाड़ी के ठीक ऊपर बनी छावनी में अजीब सी शांति थी। हल्की ठंडी हवा उस पर हमारी ध्वनि का हम तक लौट कर आना एक खूबसूरत अहसास था। छावनी की छत पर चित्तरंजन शहर के उन जगहों के नाम लिखे थे जो उस बिन्दु पर खड़े होकर दिखाई देते थे। हरे रंग के आधार पर खड़ा चाँदी के रंग का झण्डा फहराने का खंभा यह स्पष्ट करता था कि राष्ट्रीय पर्वों में यहाँ सम्मिलित होने की एक संस्कृति जिंदा है।

सुपरिकल्पित शहर चित्तरंजन में कुल पाँच बांध है। हिल टॉप पर बने पानी के रिजर्वर तक वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट से होते हुये पानी पहुंचता है। यहीं से पूरे चित्तरंजन शहर में पानी पहुंचाया जाता है। इस व्यवस्था के साथ ही हर इलाके में एक पार्क, एक डिस्पेन्सरी और एक प्राइमरी स्कूल की व्यवस्था इस शहर के सुपरिकल्पित होने का परिचय दे रही थी। प्राकृतिक शोभा से समृद्ध इस शहर में गांधी खमार नाम से प्रसिद्ध एक जगह हुआ करती थी। जहाँ कुछ लोग गांधी दर्शन पर अमल करते हुए चरखे से सूत कातने और खेती करके आत्मनिर्भर जीवन जीने की राह पर चलते थे। प्राकृतिक शोभा के बीच सहज जीवन जीने का यह प्रयास सराहनीय था। इस जगह पर आज राजराजेश्वरी का मंदिर निर्मित हो चुका था। समय के वार से गांधी जी की बताई राह की छाप भले ही इस जगह सिमट चुकी हो लेकिन गांधी की मूर्ति बीते हुए समय का प्रतीक बनकर आज भी खड़ी है।

विशाल मैदान के बीच स्थित चित्तरंजन का काली मंदिर यहाँ धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की आधारभूमि थी। शांतनु की स्मृति में बसा मंदिर आज विशाल और पहले से कहीं अधिक सुंदर आकार ले चुका था। लेकिन मंदिर के विशाल प्रांगण में नाटक या जात्रा (नाटक का एक रूप ) खेलने का रिवाज आज यहाँ की हवाओं से मिट चुका चुका था। इसी के समांतर रेलवे सुरक्षा बल द्वारा हाल ही में निर्मित शिव-पार्वती का अत्यंत आकर्षक मंदिर यहाँ की संस्कृति के नए साँचे में ढलने की सूचना दे रहा था।

चित्तरंजन के ऑफिस रोड पर बना बांध भी एक देखने लायक मंज़र था। बांध के दूसरी ओर भारत स्काउट एंड गाइड का ऑफिस और दूर तक फैला शूटिंग रेंज था। कर्नल सिंह पार्क के नाम से परिचित इस इलाके में आज इस पार्क के ध्वंसावशेष ही खड़े थे। जहाँ रख रखाव के अभाव में आज यह पार्क तकरीबन जंगली पौधों के आहोश में था वहीं चिल्ड्रेन्स पार्क और लोको पार्क यहाँ समय के साथ बने ऐसे दो खूबसूरत स्थान थे जिन पर से आँख हटा पाना मुश्किल था। एक बड़े से खुले मुंह के आकार का चिल्ड्रेन्स पार्क का प्रवेश द्वार और घड़ियाल, मशरूम और अलग-अलग जानवरों के आकार में बनी बैठने की जगह और झूले बच्चे तो क्या बड़े – बूढों को भी खुशनुमा वक्त बिताने का निमंत्रण देते थे। लोको पार्क में रखा भाप का इंजिन और टोंय ट्रेन इस जगह के विशेष आकर्षण थे।
अजय नदी चित्तरंजन शहर की प्राकृतिक सुषमा में चार चंद लगाती है। नदी के इस पार चित्तरंजन है तो उस पार झारखंड। नदी में पानी बेहद कम होने के कारण बड़े-बड़े पत्थर बाहर निकाल आयें थे। पत्थरों के बीच से अजय नदी पतली रेखा सी बह रही थी। नदी के इस रूप को देखकर यह अंदाज़ा लगा पाना मुश्किलथा कि कभी यही नदी अपने पानी के तेज़ बहाव से पुराने पुल को तोड़कर कई लोगों के प्राण ले चुकी थी। दरअसल बरसात में यह नदी उफनती हुई चलती है। लेकिन नदी के इस भरे-भरे इतराते रूप का अंदाज़ा इस मौसम में नहीं लगाया जा सकता था।
चित्तरंजन के इस सफर को कुछ खास लोगों ने और खास बना दिया। शांतनु के विद्यालय के साथी अभिरूप और प्रदीप्त से मिलकर उनमे छिपे समृद्ध कलाकारों को पहचानने का मौका मिला। चित्रकला के शिक्षक प्रदीप्त योग्य चित्रकारों की एक नयी पीढ़ी तैयार करने के काम में जुटकर कुछ संथाली विद्यार्थियों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने के काबिल बनाने के काम में काफी आगे निकाल चुके थे। अभिरूप में दुर्गम जगहों पर पहुँचकर खींचे तस्वीरों को कलाकार की नज़रों से देखते हुए पेंटिंग इफेक्ट के जरिये दुर्लभ कलारूप को आकार देने का जुनून था। उस पर सफर में मिली साथी ऋतिका का होली पर निमंत्रण और उसके परिवार का अपनत्व भाव, होली में रंगों से स्वागत सरल और सहज सौन्दर्य का अहसास दिला रहा था।

अजय नदी का आकर्षण इतना दुर्निवार था कि हम अगले दिन सुबह भी सैर के लिए अजय नदी के किनारे गए। रास्ते में सुंदर पहाड़ी और शांतनु का प्राथमिक विद्यालय भी देखा। ये वे जगह थे जिनकी बातें मैंने सुनी थी। लेकिन फुर्सत से देखने का मौका आज मिल रहा था। रास्तों से गुजरते हुए ऐसे तमाम बंगले और क्वार्टर दिखे जो वहाँ रहने वालों की बागवानी के प्रति विशेष रुचि का अहसास दिला रहे थे।लेकिन ऐसे कई घर भी दिखे जहाँ सब्ज बागों और फूलों का साम्राज्य नहीं था। यह अंतर इस बात का अहसास दिला रहा था कि सचमुच इन्सानों के हाथ में जादू है। सुरुचि और खूबसूरत सजावट हमेशा पूंजी की मोहताज नहीं होती। आदमी साधारण चीजों से ही अपने घर आँगन को स्वर्ग सा बना सकता है।

अच्छे दोस्त बड़े किस्मत से मिलते हैं। दोस्तों के बीच बंधन को तिल-तिल कर तैयार करने में उस जगह की संस्कृति,जीवन शैली का बहुत बड़ा योगदान होता है। चित्तरंजन में बिताए दिनों की खुशनुमा यादें, हमारे आने की खबर सुनते ही शांतनु के दोस्तों को हमारे गेस्ट हाउस में खींच लाई। खासकर अभिरूप की आँखें चित्तरंजन को एक कलाकार और नवोन्मेषी निगाहों से देखती थीं। चित्तरंजन के हर गली कूचों को हम देख सकें इसलिए उसका विशेष आग्रह था कि हम एकदम सुबह उसकी गाड़ी से ही यहाँ के जर्रे-जर्रे को घूमकर महसूस करें। जिन राहों से शांतनु विद्यार्थी जीवन में कभी साइकिल से जाया करते थे उन्हीं पसंदीदा और मसृण राहों से खुद ड्राइव करने का आनंद और रह-रह कर पुरानी यादों के उमड़ आने की खुशी उसकी आँखों से जाहिर हो रही थी। हम उस मुकाम तक गए जहाँ से एक संथाली गाँव शुरू होता था। जहाँ शांतनु अक्सर आया करते थे। लेकिन आज वहाँ गाँव नहीं पक्के मकान थे। वक्त के साथ आए इस बदलाव से संथाली गाँव देखने की हसरत उस वक्त पूरी न हो पाई।

संथाली गाँव देखने की हसरत मन में लगातार हिलोरें ले रही थी। अभिरूप चित्तरंजन से बाहर बहुत दूर निर्जन जगहों पर अक्सर तस्वीरें खींचने जाया करते थे। एक खूबसूरत क्षण को कैमरा बंद करने के लिए कई महीनों तक एक ही जगह पर जाकर इंतजार किया करते थे। छुट्टी के दिन को इसी तरह बिताने की उनकी आदत थी। उन्हें ऐसे संथाली गाँव का पता था जो अब भी शहरी छाप से मुक्त थे। फिर क्या था, उनके निर्देशन में हम बोडमा पहाड़ की ओर चल पड़े। पहाड़ी के करीब पत्थरों को एक विशेष रूप में रखा हुआ देखकर हम रुके। अभिरूप ने बताया कि ये पत्थर शुरू से ऐसे ही खड़े हैं। लगभग अट्ठाईस सालों से अभिरूप यहाँ लगातार आ रहें हैं। यहाँ महुए के पेड़ों की भरमार है। ताल के पेड़ के पत्ते एक दूसरे से घिसकर मर्मर की ध्वनि पैदा कर रहे थे।उस पर सामने खड़ा बोडमा पहाड़ और खूबसूरत लगता था। जो पहाड़ पहले लगभग वृक्षहीन था आज उसमें कई छोटे-छोटे वृक्षों को देखकर अभिरूप ने इस बदलाव की सूचना दी। वहाँ से हम संथाली गाँव चंद्रदीपा की ओर बढ़ रहे थे। दूर से दीवार पर चित्रकारी किए हुए मिट्टी के घर दिखे। दीवारों पर बने चित्र लोगों की सौन्दर्य चेतना का अहसास दिला रहे थे। संथालियों के घर की यह खासियत है कि प्रवेश द्वार के बाद ही ग्वाल घर होता है। फिर मुर्गी, सूअर, बकरियों का घर, आँगन में मिट्टी का बना चूल्हा और धान पर भाप देने के लिए बना मिट्टी का एक दूसरे किस्म का चूल्हा भी। सीतामणि मुरमु के घर घुसते ही भात के माड़ की सी गंध आयी। यह सूखे महुए के फूल से निकले फलों की गंध थी। किसमिस से दिखने वाले इन फलों को सुखाकर महुए का नशीला रस बनता है। हर साल जनवरी में संथाली अपने घर की फीकी हो गयी दीवारों के चित्रों में रंग भरते हैं। किसी के दीवार पर मोर बना था तो किसी के दीवार पर लाल और काली रेखाओं का डिजाइन।

अब हम चंद्रदीपा से लादना गाँव की ओर बढ़ रहे थे। इस गाँव के आखरी प्रांत में बराकर नदी खत्म होती है। यह माइथन का पिछला हिस्सा है। रास्ते में कीर्तन के लिए शामियाना लगाए जाने के कारण हमारी गाड़ी लादना नहीं पहुँच पाई। हम पहाड़ के ऐश्वर्य को चार चंद लगाती और उसके कदमों को छूती नदी के किनारे बैठकर सूर्यास्त देखना चाहते थे। अभिरूप ने भी पहाड़ के दूसरी ओर से ऐसा ही दृश्य दिखाने की बात ठान ली और हम बोडमा पहाड़ को पीछे छोड़कर किलही पहाड़ की ओर बढ़ने लगे । उसी रास्ते से हम बराकार नदी के किनारे पहुंचे जो माइथन का एक और पिछला हिस्सा था। जहाँ बांध बनाकर नदी को रोक दिया गया था । यहाँ पहले गाँव हुआ करता था। गाँव को वहाँ से हटाकर ऊपर बसा दिया गया था। सूर्यास्त से लगभग एक घंटा पहले हम यहाँ पहुँच चुके थे। दूर खड़े पहाड़ और नदी के प्राकृतिक ऐश्वर्य के बीच हमने सूरज को लालिमा बिखेरते हुए डूबते देखा। वक्त के साथ नदी में सूरज का प्रतिबिंब लंबा होता जा रहा था। हम उस दृश्य को एकटक देख रहे थे। और अभिरूप संथाली बच्चों से लगातार बात करते हुए उनकी तस्वीरें खींच रहे थे। उनका विश्वास आजकल इस बात पर टिका हुआ था कि जिंदगी के छोटे-छोटे पलों की कहानी जीवन की लंबी कहानी से कहीं ज्यादा जीवंत होती है। इन पलों की कहानी को तस्वीरों के जरिये अभिव्यक्त किया जा सकता है। वह भी कुछ ही घंटों में खींची तस्वीरों से, किसी बात से पैदा हुई अनुभूति से चहरे पर उभर आई रेखाओं के जरिये। यह सिरीज़ फोटोग्राफी है। अभिरूप उन संथाली बच्चों के उन्हीं पलों को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे।

पाँच दिन नजाने कैसे बीत गए और चित्तरंजन से रवाना होने का समय हो गया। चित्तरंजन शहर से बाहर निकलते ही हिंदुस्तान केब्ल्स द्वारा बसाया गया वह शहर दिखा जो अब उजाड़ चुका था। टेलीफ़ोन के तार बनाने वाली यह कंपनी मोबाईल की संस्कृति के आने के साथ ही उजड़ने लगी थी। वक्त की तेज़ धार में बहकर हिंदुस्तान केब्ल्स का वह शहर आज उजाड़ बस्ती बन चुका था। शांतनु ने ड्राइवर से उस उजड़े शहर का चक्कर लगाते हुए जाने का आग्रह किया। उसकी आँखें आज उन क्वार्टरों का उजड़ा हुआ रूप देख रहीं थीं जिसे कभी उसने आबाद देखा था। जहाँ रहने वाले मित्रों के घर कभी उसका आना जाना था। कभी बेहद सजा हुआ जी0एम0 का बंगला आज जंगली पेड़ों के कब्जे में था। यह कंपनी बदलते वक्त के साथ खुद को नए साँचे में ढाल नहीं पाई थी। इसका परिणाम हमारी आँखों के सामने था।

पक्के रास्ते को छोड़कर नदी के बगल से गुजरने वाले कच्चे रास्ते से हमारी गाड़ी माइथन पहुंची। ड्राइवर का ही विशेष आग्रह था कि हम इस रास्ते के सौन्दर्य को महसूस करें। आसनसोल पहुँचते ही रेलवे अफसर श्री एच0 के0 मीणा की सहृदयता और स्वागत के अनोखे अंदाज़ ने इस सफर में हमें एक और खुशी का पल भेंट किया। चित्तरंजन से हम अपनी आँखें और मन को खुशियों से भरकर लौट रहे थे। यही खुशियाँ व्यस्त ज़िंदगी में मन को उपयुक्त रसद देतीं हैं।

ऊंचे पहाड़ों के बीच मेघों की आँखमिचौनी के प्रति मेरा गहरा रुझान रहा है। तभी तो गर्मियों की छुट्टियों का ख्याल आते ही उत्तर बंगाल के ऋश्यप, कोलाखाम और चारकोल की खामोश वादियों में वक्त गुजरने की चाह मन में बरबस उठने लगी। छुट्टियाँ शुरू होने के पहले के अंतिम दो सप्ताह की व्यस्तताएं और भागदौड़ के पलों को हम पहाड़ी की खामोशी में डूबने के इंतज़ार में काट रहे थे।
सफर पर निकलने के दिन पास आ रहे थे। लेकिन इसी बीच नेपाल के खौफनाक भूकंप सफर के दिन गिनते मन को बेचैन कर गया। सफर को रद्द करने का पूरा दबाव रिशतेदारों की और से बना रहा। लेकिन मन को भी साल भर दौड़ने के लिए खुराक की जरूरत थी। हमने मन की बात सुनी और दार्जिलिंग मेल से न्यू जलपाईगुड़ी के लिए निश्चित दिन पर रवाना हुये।
सिलीगुड़ी में एक करीबी दोस्त के परिवार की आत्मीयतापूर्ण मेज़बानी ने सफर का खुशनुमा अगाज़ किया। उन्हे अलविदा कहकर हमारी जीप पहाड़ी रास्तों का सफर तय करने आगे बढ़ी। मैदान से हल्की ऊंचाई तय करते ही हवाओं की नमी ने अपनी कोमल छुअन से स्वागत किया। सर्पीली राहों पर हम आगे बढ़ रहे थे और दूसरी ओर गहराती खाई में चंचल तिस्ता नदी हाँफती उफनती हुई चल रही थी। कहीं चौड़ी तो कहीं पतली। पहाड़ों के चरणों में बहती तिस्ता मानो प्रकृति के एश्वर्य पर चार चाँद लगा रही हो। कलिमपोंग शहर से गुजरते हुए हम डेलो पहाड़ पहुँच चुके थे। यहाँ बादल धुएँ की तरह हमें छूते हुए गुज़र रहे थे। हम बादलों की ऊंचाई पर थे। डेलो पार्क का मेघमय सौन्दर्य हमारे अंदर रिस रहा था। डेलो में हिल टॉप पर बनी एक छावनी के बेंच पर बैठकर ऊंचाई से पतली रेखा सी दिखती तिस्ता नदी और मेघों से कहीं ढके तो कहीं अधढके दूर स्थित पहाड़ों को हम निर्वाक देख रहे थे।
हमारा अगला मुकाम ऋश्यप काफी ऊंचाई पर था। इस गाँव से कंचनजंघा की श्वेत धवल श्रंखला दिखाई देती है। सुनहरी धूप में चमकती कंचनजंघा की बर्फ से ढकी चोटियों को देखने की हसरत पहले दिन आसमान में छाए बादलों के कारण पूरी नहीं हो पायी। रात को जमकर बरसात हो तो इस हसरत के पूरे होने की संभावनाएं थीं। बहरहाल लॉगहट के लहजे में बने कमरे की बड़ी बड़ी काँच की खिड़कियों से मैं लंबे समय तक मेघों के वादियों पर छाने और हट जाने का खेल देखती रही । इसी खेल को शायद महादेवी ने मेघों की आँखमिचौनी कहा है।
इस सफर में मैंने महसूस किया कि प्रकृति और मानव मन की गतिविधियों में गहरा साम्य है। दूर कहीं खाई से धीरे धीरे ऊपर फैल जाने वाले बादलों का आस पास के सभी नज़रों को ढक देना इंसान की दुनियादारी की चिंताओं का जीवन के खूबसूरत पलों को महसूस करने की ताकत को दबा देने के बराबर महसूस हो रहा था। मेघों के साम्राज्य को चीरकर कंचनजंघा की स्वर्णाभ चोटियाँ भला कैसे दिखे। बादल की चादर तो उस दिव्य ज्योति सी उज्ज्वल शिखर के न होने का भ्रम पैदा कर रहीं थीं।
दूर से कहीं पानी के बरसने की आवाज़ आ रही थी। दरअसल दूर की पहाड़ी पर छाए बादल अब बरसने लगे थे। और धीरे धीरे वादियों का नज़ारा भी साफ हो रहा था। आँसू मन के मैल धो देता है। बरसात ने भी आसमान के मैल को धो दिया था। रात भर की बरसात ने कंचनजंघा को देखने का दरवाजा खोल दिया था। ऊंचे ऊंचे हरे पहाड़ों के पीछे गगनचुम्भी कंचनजंघा की चमकती श्वेत धवल चोटी पहाड़ों के माथे का मुकुट लग रहीं थीं। हँसती धूप के प्रसार को देखकर यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि हरियाली से भरे पहाड़ और स्वर्णाभ कंचनजंघा का यह नज़ारा आँखों के पहुँच की सीमा में होते हुए भी कल आँखों से ओझल था।
ऋश्यप से हम कोलाखाम का सफर शुरू कर चुके थे। करीब 60 राई परिवारों का यह गाँव कोलाखाम सिक्किम और भूटान के बहुत करीब है। ऋश्यप से लावा होकर कोलाखाम पहुँचने का रास्ता था। लावा में हम बौद्ध विहार देखने के लिए रुके। लावा बौद्ध विहार का शांतिपूर्ण वातावरण और नक्काशीदार रंगीन इमारतों में गहरा आकर्षण था। यहाँ करीब सौ विद्यार्थियों को बौद्ध सन्यासी के रूप में जीवन व्यतीत करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। विशाल प्रार्थना गृह, अध्ययन स्थल और विद्यार्थियों के निवास स्थल में शांति और गांभीर्यपूर्ण सौन्दर्य छाया हुआ था। इस शांत जगह से अब हम कोलाखाम के उस मुकाम की ओर बढ़ रहे थे जिसे ’साइलेंट वैली’ के नाम से जाना जाता है।
कोलाखाम में कदम रखते ही ऋश्यप की तुलना में इसकी निर्जनता के आधिक्य का अंदेशा लगते देर नहीं हुई । यहाँ के निवासी दीपक राई की मेज़बानी में एक नए किस्म के एहसास का सफर शुरू हुआ। इस जगह से एक साथ कई पहाड़ों का ढलान दिखना और दो कतारों में बटें पहाड़ों के बीच ऋषि नदी के बहने के दृश्य को वन में गूँजते पक्षियों की आवाजों के बीच निरखना एक स्वर्गीय अनुभव था। लेकिन सच का एक पहलू यह भी है कि कोलाखाम पहुँचते ही यह स्वर्गीय अनुभूति एकाएक ही नहीं हो पायी।
कोलाखाम पहुँचते ही यहाँ की निर्जनता ने मुझे सबसे पहले छुआ। इस निर्जनता से सबसे पहले एक अंजाना सा भय पैदा हुआ। किसी सुनसान जगह में एकाएक आ पहुँचने का भय। आस पास सिर्फ घने पेड़ और सुनसान पहाड़ी रास्ता। उस पर यह खबर कि यहाँ न कोई दवाखाना है और न ही कोई डॉक्टर। यहाँ तक कि इसके निकटतम शहर लावा में भी अस्पताल नहीं मिलता। निकटतम अस्पताल कलिमपोंग में है, जहाँ पहुँचने में यहाँ से तीन घंटे लगते हैं। एकाएक मन में कई सवाल उठने लगे। शहर से इस तरह कटे गाँव में शिक्षा, मनोरंजन, जीविकोपार्जन के क्या साधन होंगे? डाक तथा बाज़ार की सुविधाएं हासिल करने के लिए निकतम शहर लावा तक दौड़ने की जहमत भी कितने लोग उठा पाते होंगे? कितना सूनापन भरा होगा यहाँ की ज़िंदगी मैं। निर्मल वर्मा की ’लाल टीन की छत’ उपन्यास में व्यक्त पहाड़ी निर्जनता और भय का ख्याल हो आया। इन्हीं ख्यालों से मन शाम तक बोझिल रहा।
रात को दूर के पहाड़ों में जुगनुओं की तरह रोशनी टिमटिमाने लगी थी। जो इस निर्जन में इन्सानों की मौजूदगी का संकेत दे रही थी। पूछने पर पता चला कि उस पहाड़ पर सिक्किम है। कोलाखाम में सिर्फ राई परिवार के लोग ही रहते हैं। अगले दिन सुबह यहाँ जिंदगी के खुशनुमा संकेत दिखने लगे। सबसे पहले नज़र पड़ी सीढ़ीदार खेतों पर। पहाड़ी ढलान पर बने सीढ़ीदार खेत यहाँ के लोगों के मेहनतकश होने का संकेत दे रहे थे। यहाँ के हर घर का एक महत्वपूर्ण अधव्यवसाय खेती है। इलाईची की खेती यहाँ इफरात में होती है। यहाँ के लोगों के लिए ऊंचाई से काफी नीचे तक चंद मिनटों में पहुँच जाना कोई बड़ी बात नहीं हैं। यहाँ के बच्चे से लेकर बूढ़े तक बड़ी आसानी से ऊंचाई से नीचे तक का सफर शॉर्टकट रास्तों से बड़ी जल्दी तय कर लेते हैं। पर्यटकों के रहने और सैर करने के प्रबंध के जरिये अच्छी आमदनी हो जाती है। दूषण मुक्त वातावरण में डॉक्टर और दवाखाने की जरूरत बहुत कम पड़ती है।
सुबह ट्रेकिंग करते हुये ढलानों पर बने कई बेहद खूबसूरत घर दिखे। उनमें से एक घर का खास जिक्र करना जरूरी है। इस घर के सामने नर्म घास गलीचे की तरह बिछी थी। खाई की तरफ एक श्रंखला में पाइन वृक्ष लगे थे। और घर के सामने रंग बिरंगे फूलों के पौधे लगे थे। एक ओर यह सौन्दर्य और दूसरी और नीचे बहती ऋषि नदी की कल कल आवाज़। इस घर के मालिक और कारीगर एक कृषक विकास राई थे। उनके सौन्दर्य बोध और समृद्ध सोच ने हमें काफी प्रभावित किया।
पहाड़ की ढलान पर बने घर के सामने एक छोटी सी जगह पर तीन बच्चों के क्रिकेट खेलने के नज़ारे ने भी यहाँ के जीवन के एक और चरित्र को खोला। बच्चों की उम्र पाँच से छह साल की होगी। पहाड़ की ढलानों पर अक्सर गेंद लुढ़क कर नीचे चली जाती थी। इस समस्या से निपटने के लिए उन्होने अपनी गेंद कागज से बनाई थी। एक गेंद के खोने पर नई गेंद बनाने के लिए कागज का इंतज़ाम भी था। प्रकृति के साथ समझौता करके ही इन बच्चों ने मनोरंजन की राह खोज ली थी। मैंने महसूस किया कि मैदानी जीवन के चश्मे से कोलखाम के पहाड़ी जीवन के चरित्र का आकलन करना संभव नहीं था।
कल मन में उभर आए तमाम दुखपूर्ण सवाल आज मन से गायब हो चुके थे। सुबह सैर पर निकलकर मिले लोगों से पता चला कि हाई स्कूल भले ही लावा में हो, पर यहाँ के लोग प्राइमरी स्कूल तक कोलाखाम में बच्चे को पढ़ाने के बाद उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए पेडून, लावा या कलिमपोंग भेज देते हैं। लावा में हफ्ते में एक बार लगने वाले हाट से लोग अपने जरूरत का सामान हफ्ते भर के लिए खरीद लेते हैं। पर्यटकों के आने की सूचनाएँ बुकिंग एजेंट से फोन पर ही मिल जाती हैं। इसलिए उनके लिए प्रबंध करने में भी दिक्कत नहीं होती। खुला प्राकृतिक परिवेश और बाज़ार से दूरी तब मुझे इनके लिए वरदान सी जान पड़ने लगी। शहरों में शिक्षा हासिल कर रही इनकी अगली पीढ़ी इस वरदान को महफूज़ रखने में कितनी कामयाब होगी यह बात मन में उठी तो जरूर थी लेकिन ऊंचे पहाड़ों के पीछे बादलों के हट जाने की वजह से उभर आई सफ़ेद अन्नपूर्णा की चोटी ने इस बात पर सोचने की फुर्सत ही नहीं दी।
घने जंगल के बीच से गुजरते रास्तों से हम कोलाखाम को छोड़कर एक और खूबसूरत मुकाम चारकोल की ओर बढ़ रहे थे। चारकोल लोलेगाँव के ऊपरी भाग पर स्थित एक छोटा सा गाँव है। यहाँ घने जंगल नहीं बल्कि चारों ओर सीढ़ीदार खेती का नज़ारा दिखता है। खूबसूरत फूलों के पौधे यहाँ की मिट्टी में आसानी से उग जाते हैं। इस गाँव के लोगों का सौंदर्यबोध भी देखने लायक है। ये पौधे चारकोल के रास्ते से गुजरने के एहसास में रंग भर रहे थे। यहाँ भी हमें ट्रेकिंग के दौरान गाँव के लोगों से घुलने मिलने का मौका मिला। चारकोल के पहाड़ के शिखर पर मेंढक के आकार का एक पत्थर है। लोगों का कहना है कि यह पत्थर बहुत दूर से दिखता है। यहाँ तक कि सिलीगुड़ी से भी। कोकोमाण्डू के फूल के साथ यहाँ के लोगों के रिश्ते को जानना भी एक खूबसूरत मंजर था। सूरज के आकार के इस सफ़ेद फूल के बगैर यहाँ उत्सव या शुभ कार्य नहीं होता। यह रिवाज़ दरअसल सूरज के प्रति उनके श्रद्धा भाव से गहरा ताल्लुक रखता है। ग्लोब जैसे पृथ्वी का मॉडल है ठीक उसी तरह इनके लिए कोकोमाण्डू का फूल सूरज का मॉडल है।
चारकोल के लोगों का आपसी मेलजोल खास तौर पर उल्लेखनीय है। चाहे पहाड़ के ढलान पर घर बनाने की बात हो या उत्सव की बात हर कोई श्रमदान के लिए तत्पर है। हर हाल में एकता बनाए रखने की कोशिश इनमें दिखती है। चारकोल की खूबसूरती से रिझकर कुछ पर्यटक यहाँ हर साल आते हैं। पर्यटन की संभावनाएं देखते हुए यहाँ कुछ पूंजीपति होटल बनाने के लिए पूंजी निवेश कर रहे हैं। लेकिन सच का एक पहलू यह भी है कि होटल के परिवेश में घर की सी आत्मीयता नहीं होती। मेजबानी यहाँ के लोगों के चरित्र में घुला है। लेकिन पर्यटकों के लिए होटल की सी सुविधाएं उपलब्ध कराने की पूंजी इनके पास नहीं हैं। और न ही शहर के पर्यटकों तक अपने होने की खबर पहुँचने का साधन इन्हें मालूम है। यहाँ आकर होटल में रहने वाले पर्यटक नेपाली संस्कृति को करीब से देखने का मौका खो देंगे। मन में बार बार यह ख्याल आता रहा कि पर्यटन को अध्ययन के विषय के रूप में चुनने वाले विद्यार्थी इन गाँववालों और शहरी पूँजीपतियों के बीच सेतु का काम कर सकते हैं। पूंजीपति अगर इनके मकान का एक भाग लीज़ पर लेने के साथ इसके प्रचार का प्रबंध करें और मेजबानी और खान पान के प्रबंध का भार इन पर सौपें तो मेजबानी से गाँववालों की आमदानी हो पाएगी और पर्यटकों को नेपाली संस्कृति का स्पर्श भी मिल पाएगा। दरअसल यहाँ के सांस्कृतिक वैशिष्ट्य से गहरा लगाव महसूस करने के कारण मन बाजारी संस्कृति के चारकोल में प्रवेश के ख्याल को परास्त करना चाह रहा था। इस सफर से लौटे हुये काफी दिन बीत जाने के बावजूद वहाँ के लोगों की मेजबानी में शामिल उनकी संस्कृति की गंध मेरी यादों में आज भी तारो ताज़ा है।

गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू होने वाली थीं। लेकिन छुट्टियों में खुली प्रकृति के बीच जाकर समय बिताने की योजना अब तक नहीं बन पाई थी। इतने कम समय में सफर के टिकट और रहने की जगह का प्रबंध हो पाना भी मुश्किल था। इच्छा में बड़ी ताकत होती है। इच्छा की ताकत से ही नेट पर जी तोड़ खोजबीन के बाद दो दिनों में हमने बंगाल के स्वर्ग दार्जिलिंग की वादियों में जाने की जरूरी बुकिंग कर डाली। ऋश्यप, कोलाखाम और चारकोल के पहाड़ी सफर में हमें चाय के बागों के दृश्यों की कमी बहुत महसूस हुई थी। इसलिए इस सफर के पहले पड़ाव के तौर पर हमने ’सिंगथम टी एस्टेट’ को चुना।

हिल कार्ट रोड से होते हुए सिंगमारी के नार्थ प्वाइंट से सिंगथम टी रिसोर्ट 1500 फुट नीचे था। एक तो तीखी ढाल, उस पर पहले लगभग दो किलोमीटर रास्ते के खुरदुरेपन ने पहले तो भयभीत किया लेकिन आगे चलकर जब चाय के बाग के दृश्य दिखने लगे तब आँखें इतनी व्यस्त हो गईं कि मन को भयभीत होने की फुरसत ही नहीं मिली। एक ही कद में छटे चाय के पौधे, राह में चाय की पत्तियाँ तोड़ती औरतें और पेड़ों का हरा चादर ओढ़कर खड़े पहाड़ का दृश्य मन में रिसता जा रहा था। इन्हीं राहों से गुजरते हुए हम सिंगथम रिसोर्ट पहुँचे।

सिंगथम टी एस्टेट दार्जिलिंग का सबसे पुराना टी एस्टेट है। सन् 1842 में जर्मन व्यक्ति स्टेन्थेल द्वारा बनाया गया बंगला ही आज सिंगथम टी एस्टेट का रिसोर्ट है। इस बंगले के प्रवेश द्वार से ही दोनों ओर कतार में लगे रंग-बिरंगे फूलों, बंगले के ठीक सामने हरे लॉन पर रखी सफेद कुर्सियों और सफेद चादर से ढ़के मेज़ और उस पर लगी छतरियों के रंगीन दृश्य ने ध्यान खींचा। इस जगह को चुनने की सबसे अहम वजह थी चाय के पौधों का मनोरम दृश्य और नीरवता। रिसोर्ट के कमरे में टंगी तांबे के रंग के फ्रेम में भूरे और सुनहरे रंग की पेंटिंग, फायर प्लेस से लेकर ड्रेसिंग टेबिल तक गहरे मेहगनी रंग के काठ पर सुनहरे रंग से की गई नक्काशी, ऊँचे छत से नीचे लटकते लैंप शेड, कुछ एंटिक शो पीस विक्टोरिया युग में होने का अहसास दिला रहे थे। कमरे की सजावट से लेकर उसमें सोच समझ कर अंधेरे को बरकरार रखने की कोशिश तक इंग्लैण्ड के रॉयल वातावरण को बचाए रखने की कोशिश दिख रही थी। कमरे की बड़ी-बड़ी कांच की खिड़कियों पर जब लताओं और गुल्मों के फैले साम्राज्य को हवा और रोशनी को रोकते हुए पाया तब इस जगह को चुनने का फैसला गलत लगने लगा। लेकिन रिसोर्ट की सजावट में विदेशीपन होने के बावजूद प्राकृतिक सौंदर्य और प्रकृति की जीवंतता ने अफसोस के हालात पैदा होने नहीं दिए। रिसोर्ट के मैनेजर सेनगुप्ता बाबू, टी एस्टेट के मैनेजर गौतम बाबू और देखरेख करने वाले युवक आदित्य की मिलनसारता ने वातावरण में अपनापन घोल दिया। रिसोर्ट के भीतर और बाहर के वातावरण में अजीब सा विरोधाभास था। रिसोर्ट के बरामदे से दिखता पहाड़ का दृश्य और पहाड़ के माथे पर सिरमौर की तरह कंचन जंघा का अचानक फूट निकलना मानो प्रकृति का नीरवता के साथ हमें दिया गया खुला आमंत्रण था। प्रकृति के इस दावत ने मन को छू लिया। शाम को रिसोर्ट में ’बॉन फायर’ की व्यवस्था थी। यहीं यहाँ के मैनेजर सेनगुप्ता बाबू से खुलकर बातचीत करने का मौका मिला। इस बंगले में साल भर में आने वाले यात्रियों में नब्बे फीसदी विदेशी होते हैं। इनकी मेजबानी से अधिक लाभ कमाने की संभावना यहाँ के वातावरण में विदेशीपन भरती जा रही है।

पहाड़ी इलाके में ट्रेकिंग की खास चाह के कारण अगले दिन सुबह हम चाय के बाग और यहाँ के लोगों की संस्कृति से रूबरू होने निकल पड़े। ट्रेकिंग करते हुए हम मैनेजर साहब के बंगले तक जा पहुँचे। फिर उन्हीं से रिसोर्ट तक पहुँचाने का श़ॉर्ट कट रास्ता जानकर वापस लौटे। राह में ही यह जानकारियाँ मिली कि यहाँ कुल 850 के लगभग लोग काम करते हैं। चाय के बाग में काम करने वाली औरतें यहाँ जमीन खरीद सकती हैं। यहाँ के परिवार मूलत: मातृसत्तात्मक हैं। फौज से सेवानिवृत्त कई अफसर, पत्नी के चाय के बाग से संपर्क होने के कारण यहाँ पत्नी के नाम से जमीन खरीदकर रह रहे हैं।

सिंगमारी के मोड़ पर विशाल सेंट जोसफ्स स्कूल था। इस विशाल और भव्य स्कूल में कई फिल्मों की शूटिंग भी हुई है। स्कूल के उल्टे तरफ रोप वे था। रोप वे से टकबर तक पहुँचना एक अविस्मरणीय घटना थी। चाय के हरे खेत और कहीं जंगल के ऊपर से होते हुए गुजरना और खामोश जगहों से गुजरते हुए पक्षियों का कलरव सुनना, एक अनोखा मंजर था। टकबर पहुँचकर एक छोटे से स्टॉल का मालिक नौजवान रोबिन के व्यवहार ने हमें मुग्ध किया। उसकी अपने दुकान से दूर दिखती चाय की फैक्टरी, चाय के बाग से होकर गुजरने वाले सर्पीले रास्तों को दिखाने की चाहत में मानो यात्रियों को इस जगह के रंग को महसूस कराने की अपील थी। आप उसके सामान के खरीददार बने या न बने इस निर्णय का प्रभाव उसके व्यवहार पर पड़ता हुआ नहीं दिखा।

टॉय ट्रेन दार्जिलिंग की एक खूबसूरत विरासत है इसकी टिकट न मिल पाने के कारण इस पर चढ़ने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हो पाया। हमें अब वापस रिसोर्ट लौटना था। हम सिंगमारी से रिसोर्ट चाय के दृश्य का जायजा लेते हुए पैदल लौटना चाहते थे। लेकिन बारिश की वजह से इस योजना को रद्द करना पड़ा। होटल पहुँचकर दरवाजे के सामने बैठकर हम उस पार के पहाड़ पर सितारों की तरह जलते असंख्य घरों की रोशनी को निहारने लगे वहीं मेरी मुलाकात यू. एस. से आई जेसिका से हुई। जेसिका डब्लू. एच. ओ. की ओर से प्रोजेक्ट पर काम करने अपने वैज्ञानिक पति के साथ भारत आई थी। उसे भारत बेहद पसंद था और यहाँ की हवाओं में भारतीयता की गंध महसूस करना चाहती थी। लेकिन सिंगथम रिसोर्ट में उस गंध को पाना मुश्किल था। हम कुछ ही पल में बहुत अच्छे दोस्त बन गए। भारतीय संस्कृति के प्रति जेसिका के गहरे आकर्षण ने मुझे भी उसकी ओर खींचा।

सिंगथम के बाद हमारा अगला पड़ाव था दार्जिलिंग का हैपी वैली होम स्टे। नेपाली परिवार की मेज़बानी में रहने का आनन्द हम पहले भी हासिल कर चुके थे। एक परिवार को जानना साथ ही उनकी संस्कृति को महसूस करने का मौका होटल में रहकर मिलना मुश्किल था। हैपी वैली में सुव्रत तमांग के खुशमिज़ाज परिवार के साथ बिताए पल हमारे लिए यादगार हैं।

दार्जिलिंग में कदम रखते ही बारिश ने हमारा दामन पकड़ा। प्रकृति के इस अनचाहे तोहफे ने हमें इस बात का ऐहसास दिलाया कि अनचाहे हालात में भी अगर धैर्य के साथ राहें खोजी जाएं तो अनुभवों की जोली में दुर्लभ रंग भरे जा सकते हैं। दार्जिलिंग की वादियों में मेघों का छाकर करीब के दृश्य को भी धुंधला कर देना और फिर कभी हल्की-सी बरसात के साथ या फिर यूँ ही धुंधलके का धीरे-धीरे छट जाना और फिर सूरज की किरणों का हल्के-से स्पर्श करना इस मौसम में प्रकृति का खेल था। मैंने महसूस किया कि यह खेल केवल बरसात में देखा जा सकता है।

बादलों के साथ आँखमिचौनी खेलते हुए तब तक सूरज हल्का-सा निकल आया था। हम दार्जिलिंग चौरस्ते से होते हुए महाकाल शिव मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। कहा जाता है कि बरसों पहले इस मंदिर के पुजारी दोर्जे नामक महात्मा हुआ करते थे। जो यहाँ शिव की आराधना करते थे। इस दोर्जे बाबा और उनके आराध्य शिव लिंग के नाम पर ही इस शहर का नाम दार्जिलिंग पड़ा। यह क ऐसा अनोखा मंदिर है जहाँ बौद्ध और हिंदू दोनों मतावलम्बी अपने-अपने ढ़ंग से सदियों से शिव की पूजा करते हैं। शिव मंदिर के थोड़ा नीचे एक गुफा है कहा जाता है कि यहाँ महात्मा दोर्जे और फिर हातिम ताई रहा करते थे। गुफा का मुँह बहुत संकरा है उसके भीतर प्रवेश करना निश्चित रूप से दुष्कर कार्य है।

बरसात के रुकने के इंतजार के बाद जापानी मंदिर और पीस पेगोडा देखने के लिए निकलने का पल हाजिर था। दूर से ही जापानी मंदिर से नगाड़े की आवाज आ रही थी। प्रार्थना गृह में प्रवेश करते ही बौद्ध पुजारी ने बैठने का इशारा किया और एक हथपंखे जैसी वस्तु के साथ एक छोटी-सी लाठी देकर इसे सामने के श्यामपट पर लिखे लोटस सूत्र के मंत्र से ताल मिलाते हुए बजाने का इशारा किया। वह पल प्रार्थना का पल था। और उस वक्त वहाँ आने वालों को भी प्रार्थना में शामिल होने का खुला आमंत्रण था। यह जापानी मंदिर जपान के प्रमुख संपन्न फूजी गुरुजी ने बहुत पहले बनवाया था। गुरुजी ने छठी शताब्दी तक जपान में प्रचलित तमाम बौद्ध सिद्धान्तों का अनुसरण किया था। 1917 में उन्होंने बौद्ध धर्म का प्रचार आरंभ किया। उन्होंने चीन और जापान को युद्ध की मानसिकता के दुष्परिणामों के प्रति आगाह भी किया था। वे बौद्ध धर्म की जड़ों को बुद्ध की जन्मभूमि में आकर मजबूत करना चाहते थे। वे सन् 1933 में गांधी जी मिले और जब द्वितीय विश्व युद्ध में जापान में परमाणु बम फेंका गया तब वे लगातार भूखे रहकर प्रार्थना में लीन रहे। सन् 1946 में उन्होंने बुद्ध के शाश्वत जीवन से संबंधित त्याग का संदेश और ’लोटस सूत्र’ के जरिए लोगों को शान्ति और अहिंसा का संदेश देने के लिए शान्ति का प्रतीक ’पीस पैगोडा’ बनाने का निर्णय लिया। और फिर उनके अनुयायियों ने भुवनेश्वर, लद्दाख, दार्जिलिंग, वर्धा, वैशाली, नई दिल्ली, जापान, श्रीलंका, नेपाल, यूरोप, संयुक्त राष्ट्र में पीस पैगोडा बनवाया। शान्ति का प्रतीक श्वेत धवल पीस पैगोडा और उसके बीच बुद्ध की सुनहरी मूर्ति दूर से ही नजर आ जाती है। ऊँचाई पर स्थित बुद्ध की मूर्ति के पीछे की ओर बुद्ध के बाल्यकाल और निर्वाण से जुड़ी तमाम कथाएँ नक्काशीदार चित्रों में वर्णित हैं।

दार्जिलिंग जिले का सबसे ऊँचा स्टेशन घूम हमारा अगला मुकाम था। यहाँ अक्सर मेघों का साम्राज्य छाया रहता है। यहाँ दूर से दिखने वाले पाईन के वृक्षों का सौंदर्य मनोरम है। घूम में हम चौरान्वे साल पुराने बौद्ध विहार में पहुँचे। बुद्ध की सुनहरी मूर्ति प्रवेश द्वार से ही दिख रही थी। मंत्रोच्चारण से भीतर के परिवेश में अजीब-सी गंभीरता थी। भीतर के दीवारों पर बुद्ध के जीवन से जुड़ी कथाओं पर आधारित चित्रकारी शोभा पा रही थी। यह जगह घूम मोनास्ट्री के नाम से प्रसिद्ध है।

अब हम बताशिया लूप की ओर बढ़ रहे थे। बताशिया का अर्थ है हवादार। यह दार्जिलिंग के टाईगर हिल का उभरा हुआ भाग है। यहाँ छोटी गेज़ की रेललाइन घूम और दार्जिलिंग शहर के बीच दोहरे फंदे की तरह बिछी है। यहाँ युद्ध में शहीद होने वाले जवानों की स्मृति में एक अंडाकार संगमरमर के चबूतरे पर एक गोरखा सिपाही की तांबे की मूर्ति है उसके साथ ही 30 फुट ऊँची त्रिकोणाकार ग्रेनाइट के स्मृति स्तंभ पर सिपाही के सम्मान में वचन लिखे हुए हैं।

’ऑरेंज वैली’ टी एस्टेट से होते हुए रॉक गार्डन की ओर जाने का रास्ता है। चाय के बाग से गुजरते हुए हमने बादल के चादर के बागों पर छाने और धीरे-धीरे हट जाने का नजारा बहुत ऊँचाई से देखा। ये वह मुकाम था जब हम बादलों की ऊँचाई पर थे। मेघ हमें छूते हुए ऊपर की ओर उड़ रहे थे। इस मुकाम से कई फीट नीचे था ’रॉक गार्डन’ । चट्टानों से टकराती और उस पर से बहते हुए पहाड़ी झरने का पानी ’रॉक गार्डन’ से होते हुए नीचे आ रहा था। इस पहाड़ी झरने को केन्द्र में रखकर चट्टानों को काटकर पहाड़ के ऊपर तक जाने का रास्ता था। लोहे की रेलिंग, काठ के बेंच और मूर्तियों से रास्ता सजा था। बैठने के लिए जगह-जगह छावनियाँ थीं जहाँ से पहाड़ी झरने के नीचे तक बह जाने का नजारा देखा जा सकता था। चट्टानों से बहते हुए झरने की कल-कल आवाज में एक प्राकृतिक पहाड़ी छंद था।

’रॉक गार्डन’ के रास्ते से होकर गंगा माया पार्क जाने का रास्ता है। गंगा माया सन् 1986-87 में हुए भूमि आंदोलन के लिए शहीद हुई कालिंपोंग की एक वृद्धा महिला थी। उसकी स्मृति में ही यह पार्क बना था। यहाँ भी चट्टानों से होते हुए पहाड़ी झरने का बहना और इस झरने को केन्द्र में रखकर जगह-जगह बैठने की जगह की व्यवस्था आकर्षणीय थी। वापस लौटते हुए ड्राइवर ने बताया कि कुछ साल पहले ’रॉक गार्डन’ में भू-स्खलन के कारण भयानक हादसा हुआ था। ऊपर के पत्थरों के नीचे खिसक आने के कारण पुराना रॉक गार्डन नष्ट हो गया था। फिर से इसे बनवाया गया। खूबसूरती बिखेरती इन जगहों को देखकर यह अंदाज लगाना मुश्किल हो जाता है कि बरसात में यही जगह भू-स्खलन की संभावनाओं के कारण मौत की घाटी भी बन सकती है।

दार्जिलिंग सफर का एक दिन सिर्फ आस-पास की जगहों को टहलते हुए देखने और मन पसंद जगहों पर रुक कर दूर तक का नजारा देखते रहने के लिए निर्धारित था। सुबह-सुबह सैर पर निकलने के साथ ही इस दिन की शुरुआत हुई। ऊँची चढ़ाई चढ़कर हम नाइटिंगल पार्क पहुँचे। यह पार्क सुबह की सैर करने वालों के लिए आदर्श जगह है। इस पार्क में सुबह कई छोटे बच्चों को जूडो कराटे और व्यायाम का प्रशिक्षण दिया जा रहा था। पहाड़ी इलाकों में जीवन जीने के लिए जिस कठिन परिश्रम और कौशल की जरूरत होती है। उसका अंदाजा ट्रेकिंग के जरिए लगाया जा सकता है। हमारे रहने क जगह के ठीक सामने हैपी वैली टी एस्टेट था। चाय के बाग का मनोरम दृश्य देखते हुए आगे बढ़ते-बढ़ते हम कहीं कहीं थोड़ी देर के लिए रुककर नजारा देख रहे थे। इसी तरह आगे बढ़ते हुए हम पद्मजा नायडू के नाम पर बने चिड़ियाघर पहुँचे। चिड़ियाघर की योजना और यहाँ रखे जाने वाले वन्य प्राणियों के देख-रेख की व्यवस्था काबिले तारीफ है। चिड़ियाघर के साथ संलग्न हिमालयन पर्वतारोहण संस्था एक और विशेष आकर्षण था। खासकर पर्वतारोहण का संग्रहालय काबिले तारीफ है। इसका अवलोकन व्यक्ति को पर्वतारोहियों के जुनून का एहसास दिलाता है। साथ ही उनके द्वारा प्रयुक्त सामान और उनकी उपलब्धियों की जीवंत छवि को मन में बैठा देता है। यह संग्रहालय हिमालय की ’टोपोग्राफी’ का भी ऐहसास दिलाता है।

दार्जिलिंग में जहाँ कई नए आकर्षक पर्यटन स्थल दिखाई दिये वहीं लॉयड बोटैनिकल गार्डन का क्षय भी दिखा। कभी रंग-बिरंगे फूलों से सजा होने वाला यह स्थल अब जंगल-सा दिखता था। सिर्फ एक संकरा सर्पीला रास्ता नीचे तक जाता हुए दिखाई दे रहा था। इसे देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल था कि कभी यहाँ एक जगह बैठकर दूर तक देखा जा सकता था और छटे हुए घास और पौधे, रंग-बिरंगे फूल एक खूबसूरत नजारा तैयार करते थे। बोटैनिकल गार्डन से बाहर निकलने की चढ़ाई चढ़ते हुए दार्जिलिंग में लगभग दस-साल पहले आ चुके एक पर्यटक की आँखें यहाँ पेड़ों पर लटके संतरों के नजारे की कमी महसूस कर रही थी। भले ही यह संतरों का मौसम नहीं था लेकिन उनका कहना था कि आजकल मौसम में भी ऐसे दृश्य न दिखने का कारण है मोबाइल टावर और प्रदूषण। इसके कारण प्रकृति के कुछ खूबसूरत नजारे आज केवल अतीत की स्मृतियाँ बनकर रह गए हैं। बावजूद इसके बंगाल का स्वर्ग दार्जिलिंग आज भी पर्यटकों के एक बहुत बड़े वर्ग को खींचने की ताकत रखता है। इस सफर की खूबसूरत यादें आज भी मेरे जेहन में बसी हुई हैं।

शरद् ऋतु की हवाओं में देवी दुर्गा के आगमन की गंध-सी होती है। हर बार की तरह इस बार भी दुर्गा पूजा की छुट्टियों का हमें बेसब्री से इंतजार था। इस बार पूजा की छुट्टियों को हमने प्राकृतिक ऐश्वर्य को महसूस करते हुए बिताने की बात तय की थी। ऐश्वर्यमयी बंगभूमि के गौर पंचकूट नामक स्थान के सौन्दर्य की बात अपने साथी सुमना और माधव से सुनी थी। उस आधार पर हमने पश्चिम बंगाल के वन विकास कार्पोरेशन के दफ्तर से गौर पंचकूट में रहने की बुकिंग दो महीने पहले ही करवा ली थी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। खास कारणों से बुकिंग रद्द करने की नौबत आ गई थी और मन किसी भी तरह इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा था। तभी एकाएक विशेष ख्याल ने अनुभवों की झोली में नायाब मोती भरने का दरवाजा खोल दिया। हमने सोचा कि क्यों न हम अपने भ्रमण की योजना को थोड़ा आगे खींच लाएँ। बंगाल की धरती के पहाड़ों के निर्जन सौंदर्य के बीच हम समय बिता चुके थे। अब मन बंगभूमि के नदी के किनारे बिखरे ऐश्वर्य को महसूस करना चाह रहा था। किस्मत से वन विकास कार्पोरेशन के गौरचुमुक स्थित ’वन वितान’ नामक बंगले में दुर्गा पूजा के दौरान रहने के लिए बुकिंग मिल गयी। दुर्गा पूजा के महासप्तमी, महाअष्टमी, महानवमी के दिन मानो प्रकृति ने हमें अपने आंचल में समय बिताने का निमंत्रण दिया था। शहरी दुर्गा पूजा के शोर शराबे से दूर भाग पाने का एक अलग सुकून भी हम बुकिंग पूरी करने के साथ ही महसूस करने लगे थे।
महासप्तमी का दिन था। कभी हल्की बारिश तो कभी धूप आँख मिचौनी खेल रही थी। ऐसे ही मौसम में हम गौरचुमुक के लिए रवाना हुए। अपने घर से लगभग सवा दो घंटे का सफर था। अपनी गाड़ी में जरूरत का सामान उठाकर हम चल पड़े थे। खुशमिजाज ड्राइवर कृषानु भी किस्मत से मिला था। देखते ही देखते हम गलियों के शोर शराबे वाले रास्ते को पीछे छोड़कर डनलप से नए बाली ब्रिज वाले रास्ते पर आ पहुँचे। मसृण रास्ता, रास्तों के दोनों ओर तथा बीच में खिंची सफेद लाइनों के साथ ही चारों ओर दिखने वाली हरियाली इस लम्बे ड्राइव में सौंदर्य का रंग घोल रही थी। नेशनल हाईवे छह पर चलते हुए हम उलुबेड़िया के नीम दीघी के पास से मुड़कर गौरचुमुक की दिशा में आगे बढ़ने लगे। गोरूहाटा से पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर स्थित गौरचुमुक पहुँचने के रास्ते में दिखने वाले नजारों का अलग सौंदर्य था।
गौरचुमुक तक का रास्ता तय करते हुए मैंने महसूस किया कि जहाँ इंसानों का डेरा है वहाँ हरे दृश्यों की श्रृंखला भंग हो रही है। रास्तों पर छोटे बड़े प्लास्टिक के पैकट, कप, खाली बोतलें, कागज बिखरे पड़े हैं। इसी के साथ कुछ ऐसे भी इंसानों के घर दिख जहाँ हरियाली को बड़ी खूबसूरती से संजोया गया था। ऐसे बसेरों को देखकर लगा कि इंसानों के बसेरों और हरियाली का सामंजस्यपूर्ण अस्तित्व भी संभव है। बशर्ते कि लोगों को हरियाली के बीच रहने की रुचि हो। और चारों ओर हरियाली को पनपाने का कौशल मालूम हो। इस सफर में मन की एक अजीब आदत से भी मैं रूबरू हुई। एक ओर तो मन डूबने के लिए खामोश, शान्तिपूर्ण प्रकृति की गोद खोजता है और दूसरी ओर वह प्रतिदिन की जरूरतों का सामान हासिल करने लायक छोटे-मोटे बाजार से दूर रहने से विचलित भी होता है। लेकिन आखिरकार प्रकृति का ऐश्वर्य ही मन पर जीत हासिल करती है। तब छोटी-छोटी सुविधाओं के न होने का ऐहसास कहीं खो जाता है। आत्मा की एक जरूरी चाहत को प्रकृति का सौंदर्य पूरा करने लग जाता है। और हमारी झोली में अनोखे अनुभवों के मोती बरसने लगते हैं।
गंगा और दामोदर नदियों के संगम के ठीक सामने त्रिकोणाकार स्थल पर वन वितान का बंगला है। इसके बरामदे से संगम के नजारे को चुपचाप देखते रहना, सामने की जेटी से छूटते स्टीमर की सीटी और दूर नदी में मछली पकड़ती नावों को चिड़ियों की चहचहाहट को सुनते हुए निरखना एक अद्भुत अनुभव था। गौरचुमुक नाम से प्रसिद्ध यह जगह दरअसल नदी के किनारे बसे गाँव पूर्व वासुदेवपुर का अंग है। कोलकाता से 73 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस गाँव में हम अट्ठावन गेट नामक बैरेज को पार करके पहुँचे। पश्चिम बंगाल के कृषि विभाग के एक व्यक्ति से पता चला कि एक बड़े मैदान को काटकर दामोदर और गंगा के पानी का इस गाँव में संगम कराया गया है। संगम से ठीक पहले अट्ठावन लॉक गेट वाला बैरेज बना है। जो बरसात में दामोदर के तटवर्ती इलाके को बाढ़ से बचाने के लिए खोल दिया जाता है ताकि अतिरिक्त जल गंगा में बह जाए। बरसात के अलावा दूसरे मौसमों में जब दामोदर लगभग सूख जाता है तब लॉक गेट को खोलकर गंगा के पानी को दामोदर के तटवर्ती इलाके में बह जाने दिया जाता है। ताकि उन इलाकों को कृषि के लिए जल मिल सके। यहाँ से सिंचाई के लिए निकली नहरों को देखा जा सकता है। बंगभूमि के इस अंश में प्रकृति का सौंदर्य बिखरा पड़ा है।
हिरनों के बड़े झुंड को एक साथ देखने का मौका यहाँ पहली बार मिला था। हम गौरचुमुक पर्यटन केन्द्र के हिरनों के पार्क में थे। महादेवी की सोना का सौंदर्य मानो एकाएक उभरकर सामने आ गया। सुनहरा रंग, सरलता से भरी आँखें, चंचलता से भरी छलांगे इस जीव के सौंदर्य में चार चाँद लगाती है। लेकिन इंसानों को इसके सौंदर्य से कहीं ज्यादा रुचि इसकी कीमत और इसके गोश्त में होती है। सचमुच जंगल में रहने वाले इसे जानवर की तुलना में इंसान कितना अधिक जंगली है।
नदी के किनारे बसे गाँव वासुदेवपुर के लोग अधिकतर पशुपालन और मछली पकड़ने के व्यवसाय से जुड़े हैं। यहाँ से सिर्फ डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर दुकानों से खचाखच भरा शहरी वातावरण है। शहर की संस्कृति और साधनों के कदम इस ओर बढ़ चुके हैं। लेकिन दामोदर और गंगा के संगम पर बसे इस गाँव की अनोखी स्थिति इसे शहरी संस्कृति के पैर पसारने के बावजूद शहरों के रूखेपन से बचाने की ताकत रखती है।
दो नदियों के इस संगम स्थल के सौंदर्य को प्रात:काल की सैर के दौरान हमने और गहराई से महसूस किया। महाअष्टमी के दिन नदी के उस पार से कहीं हवा के साथ तैरती हुई आ रही दुर्गा देवी की वंदना के स्वर के साथ ही दूर किसी स्टीमर के मोटर की हल्की आवाज, चिड़ियों का चहचहाना उस पर गंगा और दामोदर नदी की लहरों के नदी के किनारों पर छलक पड़ने की आवाज वातावरण में एक संगीत-सा भर रही थी। कहीं ऊँचा तो कहीं नीचा और कहीं सर्पिले मोड़ वाले काले चौड़े रास्ते पर चलते हुए दिखने वाले नजारे बेहद खूबसूरत है। यह रास्ता पूर्व वासुदेवपुर से सीधे अट्ठावन गेट तक जाता है। सड़क के दोनों ओर ऊँचे, वृक्ष, कहीं पर दूर तक दिखते हरे धान के खेत आँखों में हरियाली भर रहे थे। सड़क के दाहिने ओर वृक्षों के ठीक पीछे दामोदर नदी का बहना, उस पर कुछ ट्रोलरों का मछली के जाल और कुछ सामान लेकर बीच गंगा में जाने की तैयारी उस जगह की संस्कृति का परिचय दे रही थी। सुबह-सुबह गाँव के लोग बकरियाँ चराने नदी के किनारे आते हुए दिखे। पहाड़ी गाँवों की तरह ही यहाँ के गाँवों की यह फितरत है कि यहाँ सुबह जीवन की गतिविधियाँ बहुत जल्दी शुरू हो जाती हैं और शाम के छह बजते ही लोग घरों में सिमटने लगते हैं। यहाँ से सिर्फ डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित अट्ठावन गेट के बाजार वाले इलाके में भले ही नौ बजे तक चहल-पहल रहे लेकिन मुख्य रास्ते को छोड़कर गाँव में प्रवेश करने के रास्ते पर आते ही खामोशी का पहरा लगा हुआ दिखाई देता है। प्रकृति के ऐसे सौंदर्य के दान का अगर उपयुक्त प्रयोग न हो पाए तो ऐसे ही जगहों पर दुष्कर्मों को पनपने की जमीन मिल जाती है। प्रकृति का यह सौंदर्य मानव और मानवता को समृद्द करने के लिए मिला दान है। इस दान को ध्यान के केन्द्र में रखकर अगर जीवन को स्वस्थ और सुन्दर बनाने वाली गतिविधियों वाले जगहों का रूप देने की परिकल्पना की जाए तो समाज में प्रकृति का सौंदर्य घुल सकता है। प्राकृतिक सौंदर्य के इस उपहार का ऐसा प्रयोग जरूरी भी है। बंगभूमि का यह ऐश्वर्य यहाँ के लोगों को प्रकृति द्वारा दिया गया एक नायाब तोहफा है।
गौरचुमुक से बाइस किलोमीटर की दूरी पर एक और खूबसूरत जगह गादियारा स्थित है। यह जगह भागीरथी, रूपनारायण और हल्दी नदियों का संगम स्थल है। पिकनिक के लिए प्रसिद्ध इस जगह पर पहुँचकर महसूस हुआ कि यहाँ कुछ घंटों के लिए रुककर लौटने से आँखें तृप्त नहीं हो सकती। यहाँ प्रकृति के ऐश्वर्य का एक अलग रूप है। इसे समझने के लिए यहाँ अलग से दो दिन बिताना जरूरी है। यहाँ पश्चिम बंगाल पर्यटन विभाग द्वारा निर्मित रूपनारायण पर्यटन केन्द्र दर्शकों को रहने के लिए खूबसूरत परिवेश के जरिए आमंत्रित करता है। नदी के ठीक किनारे बना रास्ता और रास्ते के किनारे बने कांक्रीट के बेंच पर्यटकों को घंटों तक बैठकर इस संगम स्थल को निरखने का मौका देते हैं। गादियारा में सूरज की किरणों ने नदी के वक्षस्थल पर गिरकर इसके जल को कहीं सुनहरे आलोक से भर दिया था, तो कहीं किरणों के सीधे जल पर न पड़ने के कारण जल नीली आभा से युक्त दिखाई दे रहा था। नदी के जल के साथकिरणों का यह खेल देखकर मन तृप्त नहीं हो पाया था कि लौटने का समय हो गया। हम लांग ड्राइव करके गौरचुमुक से गादियारा पहुँचे थे। शान्तनु के लिए यह रास्ता नया था। लेकिन इस रास्ते की मसृणता और लगभग हर मोड़ पर लगे दिशा सूचक बोर्ड की वजह से यह सफर आसान, खूबसूरत और यादगार सफर रहा। अंधेरा होने से पहले हमारा वापस लौटना जरूरी था और हम लौट रहे थे। लेकिन इस संकल्प के साथ कि अगली छुट्टियाँ शुरू होते ही हम इस स्थान पर कम से कम दो दिनों के लिए जरूर आएँगे।
गौरचुमुक पहुँचने के बाद से ही गंगा नदी के स्टीमर, ट्रोलर के साथ ही सामान ढोने वाले बड़े-बड़े जहाज दिखने लगे थे। मन में रह-रह कर कुछ सवाल उठ रहे थे। नदी के उस पार कौन-सा इलाका है? ये बड़े-बड़े जहाज आखिर कहाँ से आ रहे हैं और कहाँ जा रहे हैं? स्टीमर से इस पार आने वाले यात्री आखिर किस इलाके से आ रहे हैं? कुछ दूर जाकर गंगा बल खाकर दाहिनी ओर मुड़ी हुई दिखाई दे रही थी। मुड़ने की वजह से नदी का उस पार भी दूर कहीं एक सीमा पर खत्म हुआ-सा जान पड़ रहा था। और मुड़ी हुई नदी के बायीं ओर एक और तटवर्ती इलाका दिख रहा था। रात के वक्त इसी तटवर्ती इलाके में बेहद तेज रोशनी दूर से दिखाई देती थी। दूर तक दिखाई देने वाली इस नदी के तटवर्ती इलाकों के प्रति जिज्ञासा और कौतूहल बढ़ता ही जा रहा था। इसी का असर था कि हमने स्टीमर के जरिए उस पार को देखने का निर्णय लिया। उस स्टीमर पर सिर्फ हम ही थे जो कौतूहल वश जल पथ का यह सफर तय कर रहे थे। बाकी सभी के लिए नदी के उस पार जाना दैन्यदिन का प्रयोजन था। नदी के उस पार बुरुल गाँव से रोशनी का झुरमुट दिखता था। यह बात वहाँ पहुँचकर पता चली। पूर्व वासुदेवपुर का घाट पक्का था। स्टीमर पर चढ़ने में दिक्कत नहीं हुई। लेकिन बुरुल का घाट कच्चा था। स्टीमर से घाट तक पहुँचने के लिए बाँस का लगभग 15 मीटर कच्चा सेतु बना हुआ था। सेतु से स्टीमर की ऊँचाई काफी ज्यादा थी। उसे पाटने के लिए एक लकड़ी का पट्टा स्टीमर से सेतु तक बिछा दिया गया जाता था। स्टीमर पर खड़ा एक आदमी कंधे पर बाँस लेकर सेतु पर टिका देता था। यात्री बाँस को पकड़कर लकड़ी के पट्टे पर पैर रखते हुए बाँस के सेतु तक पहुँच रहे थे। इसी तरह साइकिल, मोटरबाईक भी स्टीमर के जरिए नदी के उस पार पहुँच रहे थे। बरामदे पर बैठकर इन तटों को दूर से निरखते हुए अक्सर ऐसा लगता था कि उस पार शायद और भी कोई खूबसूरत जगह होगी। लेकिन बुरुल पहुँचकर जब हमने अपने ’वन वितान’ बंगले को दूर उस पार से देखा तो महसूस किया कि सचमुच ’वन वितान’ वाला तट यहाँ से ज्यादा खूबसूरत है। वापस लौटकर जब बरामदे से बुरुल गाँव का तटवर्ती इलाका दिख रहा था, तब पहले जैसा कौतूहल नहीं रहा। कौतूहल अगर था तो सिर्फ उन बड़े-बड़े जहाजों के संबंध में कि आखिर ये कहाँ से आते हैं और कहाँ जाते हैं? जल पथ से बुरुल तक का सफर तय करते हुए हमें रास्ते मे एक त्रिकोणाकार लोहे का ढांचा दिखा। लोगों से पता चला कि यह जहाजों के चलने के पथ की सीमा को निर्देशित करने के लिए यहाँ रखा गया है। इसका आधार मिट्टी में गड़ा हुआ है। हमारे कौतूहल ने हमें ग्राम बांग्ला के लोगों के जीवन से जुड़े एक बड़े पहलू के रूबरू होने का मौका दिया था।
देखते ही देखते दशमी का दिन आ गया था। हम घर लौटने की तैयारियों में लगे थे। सफर के दौरान अपने अनुभवों को मैं कागज के टुकड़ों पर लिखती रही थी। उन्हें पढ़ते हुए उन ताजी यादों में और ताजगी भरते हुए मैं लौटने का सफर तय कर रही थी। इस यात्रा संस्मरण में उन्हीं पन्नों में लिखे अनुभवों को पेश किया है।

हावड़ा जिले के उलुबेड़िया में स्थित गौरचुमुक के शांतिपूर्ण वातावरण में बिताई दुर्गा पूजा की छुट्टियों की यादें अब भी मन में ताजा थीं। इसी सफर में हम एक दिन गादियारा घूम आए थे। रूपनारायण, गंगा और दामोदर नदी के संगम स्थल पर बसा गादियारा आंखों की तृष्णा को तृप्त करने की ताकत रखता है। चंद लम्हें बिताकर गादियारा से लौटना मन को रास नहीं आ रहा था। तभी मन ने तय कर लिया था कि यहां फिर आना होगा। आज संकल्प पूरा करने का वह दिन हाजिर था। नदी के किनारे जगह-जगह बने बेंच, खुला उद्यान, नदी का चौड़ा वक्षस्थल और हरियाली के बीच पक्षियों का कलरव बुजर्गों के लिए भी इस जगह को आदर्श ठहराता है। यहां आकर कहीं और कुछ देखने निकलने की गुंजाइश नहीं रहती। नदी के ठीक किनारे बसा रूपनारायण पर्यटन केंद्र और उसका सजीला प्रांगण शिशु से लेकर बुजुर्ग तक को खुलकर प्रकृति के साये में वक्त बिताने का न्यौता देता है। प्रकृति के इस खुले निमंत्रण पर मेरे और शांतनु दोनों के माता-पिता के साथ हम गादियारा के सफर पर रवाना हुए।
दिसंबर का सर्द मौसम उस पर किरणों की ऊष्ण छुअन शरीर और मन दोनों को तरोताजा कर रही थी। साथ ही दूर-दूर तक फैले धान के खेत ग्राम बांग्ला के सौंदर्य में चार चाँज लगा रहे थे। धान की कटाई हो चुकी थी। इसलिए दूर-दूर तक फैली जमीन पीली चादर ओढ़ी हुई सी जान पड़ रही थी। हम डाब (कच्चा नारियल) के भंडार के बगल से गुजरे। लेकिन यहां अगर आपको डाब का पानी पीना हो तो गंवई ढंग से बगैर स्ट्रा के पीना होगा। इस तरह डाब का पानी पीने का आनंद ही निराला है। मसृण सड़क पर दौड़ती हुई हमारी गाड़ी उस मुकाम पर आ पहुंची जहाँ सड़क खत्म होती है और सामने नदी का विस्तृत वक्षस्थल है। नदी के समानांतर चली गई सड़क पर कुछ दूर पहुंचते ही रूपनारायण पर्यटन केंद्र का विस्तृत प्रांगण है। लॉन, बेंच, झूले, कुछ ऊंचाई से नदी का दृश्य देखने के लिए बनी छावनी और कमरों से दिखाई देने वाला नदी का दृश्य इस जगह में सौंदर्य का रंग घोलता है। हम यहां पहुंचने के साथ ही इसी रंग में डूबने लगे थे। शाम हो चुकी थी और धीरे-धीरे रात की काली चादर इस जगह को अपने आगोश में ले रही थी। अंधेरा होते ही नदी के उस पार दिखने वाली टिमटिमाती रोशनी और नदी पर चलते स्टीमर और जहाजों की रोशनी हमारा ध्यान खींचने लगी।
पर्यटन केंद्र में जहाँ-तहां लगे झूलों ने बचपन को याद करने का न्यौता दिया और हमारे साथ आए बुजुर्गों ने भी उम्र का बंधन तोड़कर झूला झूलने का आनंद लिया। प्रकृति मां के आगोश में आकर सब शिशु से बन गए थे। इसी को प्रकृति का असर कहते हैं। जहाँ प्रकृति जननी का यह अपार सौंदर्य दिखा वहीं पिकनिक के नाम पर इस जननी के आंचल को मैला करने और स्पीकर पर बजते पॉप, रैप, डिस्को की धुनों से शांति में शोर का जहर घोलने के दुखद दृश्य भी दिखे। मौजमस्ती में मशगुल लोग प्लास्टिक कप, थरमोकोल की थाली और ढेरों कागज फैलाकर मानो प्रकृति को कुरूप बनाने की होड़ में शामिल हो गए थे। खाने, पीने और धड़कन को तेज दौड़ाने वाले भड़कीले गीतों पर बेकाबू होकर झूमने की यह अंधे बहरों की संस्कृति खामोशी में सुनाई देने वाली प्रकृति की धड़कन को दबोच कर बैठी थी। नदी का चौड़ा सीना और गगनचुंबी हरे-हरे पेड़ मानो इस संस्कृति को खामोश ढंग से चुनौती दे रहे थे। और साथ ही लोगों से यह सवाल भी कर रहे ते कि देखने, सुनने और महसूस करने की ताकत है तो महसूस करो कि इस पूरे वातावरण में मन में आनंद घोलने की असली ताकत किसमें है? इस हालात में मन ने चुपके से कहा कि प्रकृति और अंधे-बहरों की संस्कृति के बीच छिड़ी इस जंग को लोग समझना ही नहीं चाहते। फिर प्रकृति भूकंप, बाढ़, सूखा महामारी के जरिए लोगों पर कहर ढाए तो गलत कहां है? प्रकृति के शांतिपूर्ण सौंदर्य को नष्ट करने वाले भी उतने ही गुनहगार हैं जितना वे लोग जो इस विनाशलीला को चुपचाप देखते हैं।
गादियारा में कभी मोर्निंगटन दुर्ग हुआ करता था। जिसे लार्ड क्लाइव ने बनवाया था। सन् 1909 के हावड़ा जिले के गजट में इसका जिक्र मिलता है। जहाँ यह दुर्ग था, उस जगह को ’फोर्ट मार्निंगटन प्वाइंट’ के नाम से जाना जाता है। यह प्वाइंट रूपनारायण और हुगली नदी के संगम-स्थल पर है। सन् 1942 के चक्रवात के चलते यह दुर्ग ध्वस्त हो गया और आज दुर्ग के नाम पर टूटी हुई दीवार का एक अंश ही दिखाई देता है। वह भी तब जब पानी का स्तर नीचा होता है। डचों और फ्रांसीसियों पर नजर रखने के साथ ही जल परिवहन पर नियंत्रण रखने के लिए इस जगह पर बनवाया गया दुर्ग मानो इतिहास के झरोखे से गादियारा की कहानी को समझने की अपील करता है। रूपनारायण पर्यटन केंद्र के सामने से निकली सड़क पर खड़े होते ही रूपनारायण नदी में टूट फूट कर गिरी हुई दुर्ग की दीवार का अंश दिखा। इसी के साथ मन इस बात की कल्पना भी करने लगा कि यह दुर्ग आखिर कैसा था? इस कल्पना को एक महिला के इस कथन से पंख मिले कि उनके पूर्वजों ने यहां दुर्ग का काफी ज्यादा अंश देखा है। देखते ही देखते पानी का स्तर ऊपर उठने लगा और दुर्ग का टूटा हुआ अंश नदी की गोद में इस तरह समा गया कि इस बात का अंदाजा लगाना ही मुश्किल था कि यहां किसी दुर्ग का ध्वंसावशेष भी है। नदी और इतिहास के बीच यह अद्भुत सांठ-गांठ है। कभी नदी इतिहास को अपने भीतर से झांकने का मौका देती है और कभी उसके नामोंनिशा तक न होने का भ्रम पैदा करती है।
सुबह का हम सबको बेसब्री से इंतजार था। खास कर सूर्य की पीली किरणों से नदी के वक्षस्थल के रंग जाने का दृश्य देखने को मन उत्साहित था। नदी की चंचल लहरों पर सूरज की किरणें नाच रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो सूर्यलोक से नदी तक एक पीली रोशनी का जीना बन गया है। सूरज की किरण परियां मानो नदी का जल स्पर्श करने के लिए आसमान से उतर रही हैं। इस दृश्य में आंखें कुछ देर तक खाई रहीं।
कठिन परीक्षा की घड़ियां सामने थीं। इस परीक्षा में अगर सफलता हासिल हो पाए तो अनोखे अनुभवों की शृंखला जयमाला लिए हमारा इंतजार करती हुई मिलेगी वरना पराजय को स्वीकार कर खास अनुभवों को पाने की इच्छा का इस बार के लिए त्याग करना होगा। परीक्षा थी गादियारा से जल पथ से गेओंखाली नामक गांव पहुंचने की। गादियारा की जेट्टी पक्की है। लेकिन गेओंखाली में पक्की जेट्टी नहीं है। काठ के तख्ते पर पैर रखते हुए बांस को पकड़कर स्टीमर से जमीन तक पहुंचना पड़ता है। तख्ते से अगर पैर फिसले तो सीधे पानी में गिरे। हमारे दल के चार बुजुर्ग और मेरी दस साल की पुत्री को लेकर सबसे ज्यादा चिंता थी। इस राह से जाने में अगर नाकाम रहे तो तकरीबन ढाई घंटे का सफर सड़क से तय करके वहां पहुंचा जा सकता है। लेकिन उसके लिए अगले दिन नदी के किनारे एक खूबसूरत जगह पर बैठकर पूरा दिन नदी को निरखने की योजना रद्द करनी होगी। मन इस बात की इजाजत नहीं दे रहा था। आखिरकार हम हिम्मत करके गेओंखाली के स्टीमर पर चढ़ गए। नौ बजने के बाद धीरे-धीरे पानी का स्तर ऊंचा हो जाता है तभी गेओंखाली के घाट पर काठ के तख्ते से जमीन तक की दूरी भी कम दिखी। जैसे तैसे बांस को कसकर पकड़कर तख्ते पर पैर रखते हुए जब हम जमीन तक पहुंचे तब लगा जैसे जंग जीतकर आए हैं। हम तो खैर पर्यटक थे, लेकिन रोज कई सौ लोग इसी रास्ते से रोजी रोटी कमाने के लिए नदी के दूसरे किनारे तक पहुंचते हैं। उनके कष्ट की बात सोचते ही जिंदगी से हमारे गिले शिकवे कहीं रफूचक्कर हो गए। गेओंखाली से ही महिषादल जाने का रास्ता था। क्रांतिकारी कवि निराला का निवास स्थल, महिषादल का पुराना महल और जानकी देवी द्वारा निर्मित नया महल, गोपाल जी का मंदिर और राजघराने की संस्कृति का आभास पाने का मौका हमारे इंतजार में खड़ा था। नदी पार करते ही हम टोटो से महिषादल राजबाड़ी की ओर रवाना हुए।
सुंदर सजीले सती सामंत रेलवे स्टेशन के नीचे से गुजरते हुए, महिषादल राज महाविद्यालय का भव्य भवन पार करके हम श्वेत धवल ’महिषादल राजबाड़ी’ के सामने पहुंचे। श्वेत रंग के साथ सुनहरे रंग का बार्डर इस भवन को आभिजात्यपूर्ण स्वरूप दे रहा था। विस्तृत हरा मैदान, झील, झील के किनारे लगे खूबसूरत वृक्ष इस जगह में सौंदर्य का रंग घोल रहे थे। इसके खूबसूरत परिवेश के कारण इस जगह को फिल्मों के शूटिंग स्पॉट के रूप में भी इस्तेमाल किया गया है। छोटी बड़ी झीलें, पाम वृक्ष इस जगह को अनोखे सौंदर्य से भर रहे थे। नए महल के निचले तल्ले में राजघराने का संग्रहालय है। सोलहवीं सदी में उत्तर भारत में आए व्यापारी जनार्दन उपाध्याय गर्ग ने महिषादल में जमींदारी स्थापित करने के लिए विशाल संपत्ति खरीदी थी। 18वीं सदी में रानी जानकी देवी के काल में इस राज की गरिमा चरमोत्कर्ष पर पहुंची थी। रानी जानकी देवी द्वारा बनवाया गया नया महल ही आज महिषादल राजबाड़ी के नाम से प्रसिद्ध है। राजबाड़ी के एक कक्ष में राजा एवं उनके वंशधरों की तस्वीरें और उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुएं रखी हैं। इस कक्ष में प्रवेश करते ही राजघराने की संस्कृति का स्पर्श मिलता है। दूसरे कक्ष में राजाओं द्वारा शिकार किए गए जानवरों को कुछ इस तरह रखा गया है कि वहां प्रवेश करते ही कुछ जानवर जीवित जानवरों के समान खड़े दिखते हैं। शेर, हिरण, मगरमच्छ, भालू, बाइसन, चीता, बाज़ पक्षी जिनका वर्षों पहले शिकार किया गया भला आज भी उनके शरीर को इस तरह रख पाना कैसे संभव हो पा रहा था, इसी बात का जवाब मैं खोज रही थी। तब संग्रहालय के एक व्यक्ति ने बताया कि यहां जानवरों की खालें और चेहरे असली हैं। लेकिन शरीर का ढांचा बनाकर उस पर खाल चढ़ा दी गई है। साथ ही आंखें भी कृत्रिम ढंग से बना दी गई हैं। रासायनिक पद्धति से खालों की सुरक्षा का प्रबंध किया गया है। इस कक्ष को देखते ही मन मे यह सवाल भी उभर आया था कि निरीह जानवरों का शिकार करके कोई भला आनंद कैसे पा सकता है? राजा के तख्त पर बैठकर परिवेश को शांति और सौंदर्य से भरने के कितने महत् कार्य किए जा सकते हैं। इन्हें छोड़कर मासूम जानवरों के शिकार में ऊर्जा व्यय करना क्या मनुष्यता के धर्म का सही ढंग से पालन करना है?
महल के एक और कक्ष में राजाओं के बिलियार्ड खेलने के समान हैं। एक कक्ष राजाओं के विपुल अस्त्र शस्त्र, जूते, वाद्य यंत्रों से भरा है। साथ ही एक विश्राम कक्ष भी है, जहाँ एक पियानो, ग्रामोफोन, राजसी कपड़ों के साथ एक बड़ा और ऊंचा बिस्तर है जिस पर सीढ़ी से चढ़कर एक गेट से होकर प्रवेश किया जाता है। बिस्तर पर रखे तकियों का आकार भी विशालकाय है।
महिषादल का पुराना महल एक खंडहर सा दिखता है। जिसके सामने सिंह की दो मूर्तियां रखी हुई हैं। इसी के सामने से गुजर कर हम रानी जानकी देवी द्वारा बनवाए गए गोपालजी मंदिर तक पहुंचे। इस मंदिर में असली सोने की मूर्ति हुआ करती थी। उस मूर्ति के चोरी हो जाने के बाद आज यहां दर्शनार्थियों के लिए किसी अन्य धातू से बनी मूर्तियां रखी गई हैं। बारह बजे यह मंदिर बंद हो जाता है और फिर तीन बजे दर्शनार्थियों के लिए खुलता है। मंदिर के पिछवाड़े में एक तालाब है और मंदिर प्रांगण से ही सीढ़ियां उस तालाब तक चली गई हैं। तालाब के बगल से निकले रास्ते के दोनों ओर पाम के वृक्ष कतार में खड़े हैं।
महिषादल राजबाड़ी के इलाके से अब हम नटशल रामकृष्ण मिशन की ओर रवाना हो चुके थे। नदी के समानांतर दूर तक चली गई सड़क के दोनों ओर लगे वृक्ष परिवेश को सौंदर्य से भर रहे थे। रामकृष्ण मिशन के पास सड़क के उस पार नदी की ओर विस्तृत ऊंचा भूखंड था। जिस पर दूर तक हरी घास फैली हुई थी। साथ ही कहीं-कहीं फसल भी उगाई गई थी। इस भूखंड पर बैठकर नदी का नजारा देखने का आनंद ही कुछ और था। सड़क के पास नदी के किनारे के इस मैदान पर बैठकर ऊंचाई से नदी को देखा जा सकता था। नदी के जल का स्तर बढ़कर भी इस भूखंड को भिगो नहीं सकता था। यहां की हवा में अद्भुत शांति थी। उस पर रामकृष्ण मिशन का परिवेश यहां की हवा को और भी शांति से भर रहा था। इसी जगह से श्री रामकृष्ण ने यहां अपने विचारों का प्रचार-प्रसार आरंभ किया था। रामकृष्ण मिशन के इस प्रांगण में कई किस्म की फसल उगाई गई है। आत्मनिर्भर बनाने के लिए यहां दर्जी और बढ़ई का काम भी सिखाया जाता है। रामकृष्ण मिशन से लौटते हुए रास्ते में सिंचाई दफ्तर का सरकारी बंगला दिखा। विशाल प्रवेश द्वार से सीधे बंगले तक जाने वाला लाल मिट्टी का रास्ता। दोनों ओर लगे पाम के वृक्ष। एक ओर बड़ा तालाब और बंगले के बरामदे से दिखने वाला नदी का दृश्य उस पर इस जगह का शांतिपूर्ण परिवेश एक स्वर्गीय अनुभूति जगा रहा था। इस अनुभूति को मन में संजोकर हम त्रिवेणी संगम टूरिस्ट लौज की ओर बढ़ने लगे।
हल्दिया डेवेलपमेंट अथॉरिटी द्वारा चलाया जाने वाला त्रिवेणी संगम टूरिस्ट लॉज एक शांतिपूर्ण जगह पर स्थित है। लॉज के प्रांगण में ही बना अम्यूज़मेंट पार्क, झील, लाल मिट्टी के रास्ते के बगल में लगे सजीले पेड़-पौधे और लॉज के बगल से निकली सड़क के उस पार नदी का विस्तृत वक्ष स्थल सौंदर्य की छटा बिखेर रहा था। उसी के बगल में बसे जल शोधन परियोजना के प्रांगण के पीछे बनी बड़ी-बड़ी झीलें आंखों में ठंडक भर रही थीं। लेकिन यहां भी अंधे बहरों की संस्कृति के अनुयायियों द्वारा बिखेरी गई थरमोकोल की थालियां प्लास्टिक, कागज दृश्य को दूषित कर रहे थे, पर विस्तृत जलाधार ध्यान को बरबस ही अपनी ओर खींच ले रहा था।
गेओंखाली से जल पथ से गादियारा लौटने का पल हाजिर था। नदी के पानी का स्तर काफी नीचे जला गया था। नदी के किनारे से काफी नीचे उतर कर स्टीमर पर चढ़ने के लिए काठ का तख्ता डाला गया था। साथ ही एक व्यक्ति कंधे पर बांस टिकाकर उसके दूसरे सिरे को नदी के निचले स्तर पर लगे पत्थर से टिकाकर खड़ा था। बांस को पकड़कर तख्ते पर पैर रखते हुए स्टीमर तक पहुंचने का काम इस बार कुछ और कठिन हो गया था। स्टीमर से आए लोगों को उतरने और स्टीमर से जाने वाले लोगों को चढ़ने में लगभग आधा घंटा लग गया। स्टीमर अपने निर्धारित समय से लगभग पंद्रह मिनट बाद छूट पाई। इस बीच पानी का स्तर लगातार गिरते जाने के कारण स्टीमर लगातार पीछे हट रहा था। और किनारे की पक्की जगह से स्टीमर की दूरी लगातार बढ़ रही थी। खुशनुमा पलों की अनुभूति ने हमारी हिम्मत थोड़ी बढ़ा दी थी। सबके साथ गेओंखाली से स्टीमर पर चढ़कर ऐसा लगा मानो इस बार के लिए हमने वैतारिनी पार कर ली।
अगले दिन सुबह रूपनारायण पर्यटन केंद्र के सामने से निकली सड़क पकड़कर रूपनारायण नदी के समानांतर उत्तर की ओर सुबह की सैर पर जाने की योजना थी। सर्द मौसम में सुबह छह बजे बुजुर्गों के उठकर हमारे साथ चलने की गुंजाइश ही नहीं थी। इसलिए मैं और शांतनु ही सुबह की सैर पर निकले। पक्की सड़क रूपनारायण पर्यटन केंद्र तक आकर ही समाप्त हो गई थी। उसके बाद से लाल मिट्टी की कच्ची सड़क थी। सड़क के दोनों ओर ऊंचे-ऊंचे पेड़ थे और हमारे दाहिने ओर रुपनारायण नदी और बाईं ओर दूर तक फैले खेत और कुछ दूरी पर उगे खजूर के पेड़ थे। सुबह की इस सैर को नदी के पानी की कल-कल ध्वनि और पक्षियों के कलरव ने और सुरम्य बना दिया था। इस संगीतमय वातावरण में हमारे कदम बस आगे बढ़ते गए। रास्ते में हमें नदी के किनारे दूर तक फैले बढ़े-बढ़े पत्थर दिखे जिन्हें नदीं के किनारों पर जमाकर किनारों को पक्का करने का काम चल रहा था। मेरी आंखें एक ऐसी जगह तलाश रही थीं जहां के वातावरण में अनोखी शांति हो। सड़क और नदी के बीच जहाँ हरा मैदान हो। जहाँ बैठकर पानी की कल-कल ध्वनि और पक्षियों का कलरव सुना जा सके। ऐसी कोई जगह उस सड़क पर चलते हुए मिलेगी या नहीं हमें मालूम नहीं था। लेकिन रास्ते में मिले कुछ गांववालों से यह जानकर कि आगे नदी के किनारे मैदान है, हम उम्मीद का दामन पकड़कर आगे बढ़ते रहे।
सुबह के इस अनोखे सैर पर निकलकर हमें ईंट बनाने की जगह को करीब से देखने का मौका मिला। इस व्यवसाय में सांचे में ढली कच्ची ईंटों को सुखाने के लिए कितने विशाल जगह की जरूरत होती है इस बात का अंदाजा पहली बार हुआ। साथ ही ईंटों को जलाने के काम को करीब से देखने का मौका भी मिला। ईंटों को जलाने के लिए लगाई गई आग को बार-बार बुझाया नहीं जाता। यह काम लगातार छह महीनों तक चलता है। बरसात शुरू होने के पहले तक। इसलिए ईंटों को जलाने के साथ ही कच्ची ईंटों को सांचे में ढालने का काम लगातार चलता रहता है। पशुपालन, मत्स्य व्यवसाय, खेती, पर्यटन केंद्र में काम करने, पर्यटकों को वाहन में घुमाने, छोटी-छोटी दुकानें चलाने के अलावा ईंट निर्माण के कारखाने में काम के जरिए गादियारा गांव के लोग जीविकोपार्जन करते हैं। यहीं पता चला कि आगे रामकृष्ण मिशन का एक परित्यक्त भवन है। उसी के ठीक विपरीत एक मैदान है जहाँ बैठकर रूपनारायण नदी को देखा जा सकता है।
रामकृष्ण मिशन के ठीक विपरीत सड़क के दाहिने ओर से एक पगडंडी नदी की ओर चली गई थी। इस पगडंडी से गुजरते हुए हम एक नर्म गलीचे की तरह बिछी हुए घास के मैदान में पहुंचे। रूपनारायण नदी के जल की कल-कल ध्वनि, आंखों के सामने नदी का विस्तृत वक्ष-स्थल, दाएं-बाएं दोनों ओर जहाँ भी दृष्टि जा पाती है सिर्फ जल ही जल था। दूर कहीं वह मसृण रेखा दिख रही थी जहाँ आसमान और जल का मिलन होता हुआ-सा जान पड़ता था। उस पर हवा भी सांय-सांय की आवाज करके वातावरण में निर्जनता का आभास पैदा कर रही थी। रूपनारायण पर्यटन केंद्र से उत्तर की ओर चलते हुए किसी खास जगह की तलाश में हम टेटीखोला गांव तक आ गए थे। लौटने का जरा भी मन नहीं था। लेकिन वक्त को देखते हुए हम वहां से रवाना हुए। अब तो बस किसी भी तरह पर्यटन केंद्र में बैठे मेरे माता-पिता, सास-श्वसुर और बेटी को यहां लाने की धुन सवार थी। यहां तक पहुंचने का रास्ता संकरा और ऊबड़ खाबड़ था। उस पर जिन्हें हम यहां लाना चाहते थे उनके लिए यहां चलकर पहुंचना भी संभव नहीं था। इसलिए गेस्ट हाउस पहुंचते ही हमने उस ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर चलने के लिए उपयुक्त और सुरक्षित वाहन की खोज शुरू कर दी। वाहन मिलने की हमें पूरी उम्मीद थी क्योंकि यही वह रास्ता था जो टेटीखोला गांव को गादियारा जेट्टी से जोड़ता था। और यह स्वाभाविक था कि गांव से जेट्टी तक बुजुर्गों को पहुंचाने के लिए कुछ तो साधन होगा? सौभाग्य से एक टेम्पोवाला दोपहर के भोजन के बाद हमें उस जगह पर लाने के लिए राजी हुआ। बुजुर्गों के लिए इस रास्ते से गुजरना किसी एडवेंचर से कम नहीं था। साथ ही लुढ़के तो सीधे नदी में गिरने का डर भी कायम था। लेकिन वाहन चालक के आत्मविश्वास और उसकी दक्षता को देखते हुए सब धीरे-धीरे आश्वस्त हुए। इस जगह पर पहुंचना कठिन था और इसीलिए यहां सर्दी के मौसम में मौज-मस्ती में मशगुल होकर पिकनिक मनाने वालों के पहुंचने की गुंजाइश नहीं थी। इस जगह की नीरवता और शांति को बचाकर रखने का श्रेय इस दुर्गम और ऊबड़-खाबड़ रास्ते को ही देना होगा। मन में जब यह बात आई तब यहां तक पहुंचने के रास्ते का ऊबड़-खाबड़पन वरदान-सा लगने लगा। यहां पहुंचकर हम सब अनायास ही थोड़ी देर के लिए खामोश हो गए थे। खामोश होकर मानो प्रकृति की धड़कन को सुनने की कोशिश कर रहे थे। शाम का सूरज ढलने को था। नदी के वक्षस्थल पर सूरज की किरणें क्रमश: लंबी होती जा रही थीं। प्रकृति ही मानो इशारा कर रही थी कि अब लौटने का समय हो गया है। हमें उस ऊबड़-खाबड़ रास्ते से होकर गुजरना था और हम इस मनोरम दृश्य की छवि को आंखों के कैमरे में कैद करके गेस्ट हाउस की ओर रवाना हुए।
टेटीखोला से लौटते हुए हमें ईंट से बने चिमनी के आकार का एक चौकोर ढांचा दिखा। यह परित्यक्त ढांचा जहाजों को दिशा दिखाने वाला मीनार या फिर लाइट हाउस रहा होगा। इसके निचले हिस्से से लगभग तीन मीटर छोड़कर लोहे के कई छल्ले बने हुए थे, जो ऊपर तक चले गये थे। इन छल्लों से होकर एक लोहे की सीढ़ी भी ऊपर तक चली गई थी। इस ऐतिहासिक ढांचे के बारे में कुछ विशेष जानकारी नहीं मिलती। इसके अगल-बगल में गांववालों ने घर बना लिए थे। लेकिन मार्निंगटन दुर्ग के अवशेष बड़ी खामोशी के साथ इतिहास की इस हकीकत को बयां कर रहे थे कि एक समय जब ईस्ट इंडिया कंपनी को वाणिज्य व्यापार संभालने और सैनिक गतिविधियों पर नजर रखने का काम करना पड़ता था तब जलपथ पर नजर रखना जरूरी था। माल को एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाने के लिए वे जलपथ पर निर्भरशील थे। उस पर ब्रिटिशों के प्रतिद्वंद्वी फ्रांसीसी चंदननगर के पास और डच श्रीरामपुर के पास अपना उपनिवेश बनाने में जुटे थे। उनका व्यवसाय भी जलपथ के जरिए ही होता था। ऐसे में गादियारा जैसे तीन नदियों के संगमस्थल पर दुर्ग बनाने की जरूरत लार्ड क्लाइव ने महसूस की थी। आज यहां आने वाले पर्यटक इस जगह के ऐतिहासिक महत्व को जाने बगैर ही थोड़ी देर यहां घूमकर या फिर पिकनिक की मस्ती में डूबकर लौट जाते हैं। इतिहास की समझ किसी जगह को देखने के नजरिए को कितना समृद्ध कर देती है इस अनुभव से वह महरूम रह जाते हैं। अगर इस जगह के ऐतिहासिक महत्व का प्रचार किया जाए और साथ ही इस जगह की शांति और स्वच्छता को बचाए रखने के लिए कठोर कदम उठाए जाएं तो बंगाल का यह समृद्ध स्थल प्रकृति प्रेमियों, इतिहासविदों के अलावा शांतिप्रिय पर्यटकों के लिए शांतिधाम बन सकता है।

कुछ सालों से दुर्गापूजा की छुट्टियों में शहर के शोर शराबे से कहीं दूर जा कर समय बिताने की ख्वाहिशें मन को घेरने लगी थीं। दुर्गापूजा में बंगाल के विशिष्ट वाद्ययंत्र ’ढाक’ की आवाज आजकल कहीं खो सी गई है। पॉप और रैप संगीत की आवाज दिलो दिमाग पर हथौड़े की मार जैसी महसूस होती है। दुर्गा पूजा के कुछ दिन धरती पर माँ दुर्गा के आगमन के दिन माने जाते हैं। कभी-कभी यह महसूस होता है कि इतने शोर शराबे, खान पान की दुकानों की भीड़ और लाउड स्वीकरों की आवाजों के बीच क्या वाकई माँ दुर्गा का यहाँ कुछ पल के लिए भी ठहरपाना संभव है? पंडालों में माँ की मूर्ति है और लाउड स्पीकर पर फूहड़ संगीत बज रहे हैं। सांस्कृतिक स्खलन के ऐसे दृश्यों का साक्षी बनने से पहले ही मन और आँखें प्रकृति के किसी ऐसे स्थान पर पहुँच जाना चाहती थीं जहाँ शान्तिपूर्ण वातावरण में अपनी सृजन शक्ति को पर खोलने का मौका दिया जा सके। अपनी ख्वाहिशों को पंख देने के लिए हमने इस बार देवभूमि उत्तराखंड जाने का निर्णय लिया। इस बार मेरे साथ शान्तनु और बेटी राशि के अलावा शान्तनुके दोस्त प्रणव, उनकी पत्नी मैरी और बेटा प्रमीत भी था। हम सबके सोच की समानता ने हमें इस सफर में एक साथ बाँध दिया था। हिमालय के पर्वत श्रृंखला के ऊँचे पहाड़, पहाड़ों पर जमी बर्फ की श्वेत धवल आभा और उस पर देवभूमि की हवाओं में घुला अपना रंग जैसे हमें बरबस ही अपनी खींच रहा था। नैनीताल, रानीखेत, कौसानी, मुँशीयारी, अल्मोड़ा का यह सफर मेरे जीवन का अब तक का सबसे लम्बा सफर था।

उत्तर प्रदेश से उसके पहाड़ी इलाकों को अलग करके उत्तराखंड राज्य बना है। इसका जिक्र प्राचीन ग्रंथों में केदार खंड और मानस खंड के सम्मिलित क्षेत्र के लिए किया गया है। प्राचीन काल से ही इसके ऊँचे शिखर और इसकी घाटियों को देवी देवताओं का निवास स्थल माना जाता रहा है। ऐसा माना जाता है कि व्यास मुनि ने महाभारत की रचना यहीं पर की थी। और पांडवों ने भी इसी इलाके में अपना बसेरा बनाया था। सम्राट अशोक के कलसी के अभिलेख से यह भी पता चलता है कि यहाँ की भूमि में बौद्ध धर्म ने भी कदम रखे। मन में बसी यहाँ की शान्तिपूर्ण और ऐश्वर्यमयी छवि ही हमें मानो देवी के पृथ्वी पर आगमन के चंद दिनों को गहराई से महसूस करने का निमंत्रण दे रही थी।

लालकुआँ स्टेशन पहुँचकर सड़क मार्ग से हमारा नैनीताल जाने का सफर शुरू हुआ। पहाड़ के पदतल पर हरियाली के बीच खड़े छोटे-छोटे मकानों ने सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा। हरियाली और ताज़ी हवा के बीच बहती चंचल गौला नदी का सौंदर्य मन को गहराई से छू रहा था। हमें भीमताल और नौकुचिया ताल से होते हुए नैनीताल पहुँचना था। माना जाता है कि भीम ने अपने गदे के प्रहार से भीमताल की रचना की थी। नौकुचिया ताल नौ कोने वाला ताल है। माना जाता है कि इस ताल के नौ कोनों जिसे एक साथ दिख जाएँ वह अत्यंत सौभाग्यशाली होता है। पहाड़ से घिरी झील का दृश्य आँखों को ठंडक दे रहा था।नैनीताल में नैनी झील के किनारे स्थित – ओक रिज होटल में रात्रि निवास का कार्यक्रम तय था। होटल की बड़ी काँच की खिड़की से नैनी झील का नजारा मन की गहराइयों को छू रहा था। झील के उस पार के पहाड़ पर बने घर खिलौनों के घर जैसे दिख रहे थे। हरियाली के बीच बसे त्रिकोणाकार छतों वाले घर किसी चित्रकार द्वारा बनाए गए चित्र जैसे लग रहे थे। नैनी झील में तैरती मछलियों के झुंड के पानी में डाले गए दानों को लपकने के लिए बार-बार किनारे की ओर आने की प्रक्रिया को खड़े-खड़े निरखना एक अद्भुत अनुभव था।

नैनी झील के एक छोर में नैना देवी का मंदिर स्थित है। माँ पार्वती के नैन यहीं पर गिरे थे। झील के एक छोर से मन्दिर प्रांगण तक नाव जाती है। जल पथ से नौका विहार करते हुए पहाड़ों से घिरे नैना देवी मंदिर के प्रांगण तक पहुँचने का अनुभव किसी के लिए भी यादगार सफर बन जायेगा। उस पर मंदिर का अनोखा वातावरण भी मन की गहराइयों को छू लेता है। पहाड़ से नैनी झील को देखना और नैनी झील पर नौका विहार करते हुए पहाड़ को देखना स्वर्ग से धरती को और धरती से स्वर्ग को देखने के बराबर था। यह जगह ऐसी थी जहाँ धरती और स्वर्ग मानो मिल गए थे।मंदिर दर्शन के बाद हम नैनी झील को घेर कर खड़े पहाड़ के शिखर की ओर निकल पड़े थे। शिखर पर लोग हिमालय दर्शन के लिए आते हैं। आसमान साफ हो तो बर्फ से ढ़की हिमालय की चोटियाँ नज़र आती हैं। इसी जगह पर कुमायूँ मंडल विकास निगम का एक होटल है जो कभी ब्रिटिशों का बांग्ला हुआ करता था। इसी जगह पर दो सौ वर्ष पुराने जिंको विलोबा का वृक्ष दिखा। इस वृक्ष का हर अंग औषधि बनाने के काम आता है। इस वृक्ष की यह खासियत है कि इसके नर और मादा वृक्ष एक ही जगह पर मिलते हैं।नैनी झील ऊपर से आम के आकार की दिख रही थी। ऊपर से झील की पानी का रंग भी नीली आभा लिए हुए दिख रहा था। पहाड़ियों से घिरी इस नीली झील को देखना मानो कहीं स्वर्ग से एक टुकड़ा आसमान देखने के बराबर था। सिर के ऊपर दिखने वाला आसमान मानो आज जमीन पर उतर आया था।

हिमालय कई महान ऋषियों का आश्रय स्थल रहा है। यहाँ के वातावरण की अद्भुत शांति ने महापुरुषों को ईश्वरीय अनुभूति करवाई थी। शिवत्व यहां कण-कण में बसा है। ऋषियों ने पहाड़ों की गोद में स्वयंभू शिवलिंग (अपने आप बनने वाला शिवलिंग की आकृति का पत्थर) पाकर शिव का ध्यान लगाकर इन्द्रियों पर विजय हासिल करते हुए परम शान्ति का अनुभव किया। ऐसा ही एक स्थान है हनुमान गढ़ी। नीब करौरी बाबा द्वारा खोजा गया यह स्थान कदम रखते ही मन को शान्त करने की उसकी शक्ति का एहसास दिला देता है। निस्तब्धता की भी एक ध्वनि होनी है। इस ध्वनि का एहसास मुझे इस जगह पर आकर हुआ। ठीक यही एहसास मुझे एक बार फिर कैंची स्थित नीब करौरी बाबा के आश्रम में हुआ। पहाड़ की गोद में बसे इस आश्रम से सटकर शिप्रा नदी बह रही है। छोटे से एक पुल से शिप्रा नदी को पार करते हुए नीब करौरी बाबा के कैंची धाम में पहुँचकर मन में अद्भुत शान्ति फैल गई थी।

उत्तराखण्ड अकेला एक ऐसा राज्य है जिसके दो राजभवन हैं। एक राजभवन नैनीताल में स्थित है। इस भवन की बनावट स्कॉटिश महल की-सी है। सन् 1899 में बनी इस इमारत के निर्माण में ईंट, सीमेंट और बालू की जगह चूना, गुड़ और दाल का प्रयोग किया गया है। उस युग में इमारत बनाने के लिए इन्हीं चीजों का इस्तेमाल होता था। यह यूरोपीय लहजे में गॉथिक वास्तुकला के आधार पर बनी इमारत है। 205 एकड़ तक फैले इस इमारत के प्रांगण में गॉल्फ कोर्स, स्वर्गीय उपवन, स्वीमिंग पुल स्थित है। यह भारत का एक ऐसा राजभवन है जिसके दरवाजे पर्यटकों के लिए खुले हैं। इस आलीशान इमारत की भीतरी सजावट भी आलीशान है। ब्रिटिश काल के असबाब, बेल्जियम कांच से बने आईने से लेकर छाता रखने के स्टैण्ड तक एक राजशाही ठाट फैली हुई थी।

नैनीताल से लगभग ढाई घंटे का सफर तय करके हम रानीखेत पहुँचे। रानीखेत में महातपा ऋषि के अवतार माने जाने वाले हेडाखान के आश्रम के पास ही कुमायूँ मंडल विकास निगम के हिमाद्री टूरिस्ट रेस्ट हाउस में हमें रहना था। इस इलाके के जंगल का एक अलग सौंदर्य है। यहाँ पेरुल के वृक्षों का घनत्व जंगल को अंधकार में नहीं डुबोता। अपने ही फल के बीज से उगने वाले पेरूल के वृक्षों के बीच की हरी घास साफ दिखाई देती है। इस जंगल को देखकर ऐसा लगता है मानो किसी ने योजनाबद्ध ढंग से इन्हें लगाया हो।

रानीखेत का सफर विश्वविद्यालय के दोस्त मिथिलेश और मेनका की मौजूदगी के कारण यादगर सफर बन कर रह गया। रेस्ट हाउस पहुँचते ही मुझे सूचना मिली कि मिथिलेश और मेनका कुछ घंटे पहले ही हमारा इंतजार करके लौट गये थे। इस सूचना के मिलते ही मैंने मिथिलेश को मेरे पहुँचने की सूचना दी और कुछ ही मिनटों में मिथिलेश और मेनका दोनों मेरे इस दो दिनों के डेरे में पहुँचे। बरसों पुरानी यादें उनसे मिलते ही ताजा हो गईं। उम्र ढ़लने के साथ पुराने दोस्ताने रिश्ते और भी गहरे हो जाते हैं। इस बात का एहसास उनसे मिलने के साथ ही हुआ। वे दोनों अगले दिन के रात्रि भोज का न्यौता देकर गए। सूने पहाड़ों में अचानक अपनों से बरसों बाद मिलने का एहसास कितना खूबसूरत होता है, यह मैंने महसूस किया। रानीखेत में दूसरे दिन हम बिनसर महादेव मंदिर पहुँचे। गिरि संप्रदाय का यह मंदिर पेरूल के जंगल के बीच स्थित है। दुर्गा अष्टमी का दिन ऐसे एक मन्दिर में बिताना सौभाग्य की बात थी। एक ओर मंदिर के वातावरण की शान्ति और दूसरी और पेरूल के जंगल का सौंदर्य जैसे मन में रिस रहा था।

भारतीय सेना में कुमाऊँ रेजीमेंट के सैनिकों का एक खास स्थान है। दो सौ वर्ष पुराने कुमाऊँ रेजीमेंट के सैनिकों ने हमेशा से युद्ध के समय दिलेरी और साहस का परिचय दिया है। कुमाऊँ रेजीमेंट की देख-रेख में स्थित युद्ध सामग्रियों और तथ्यों से संबंधित संग्रहालय में इसके प्रमाण सुरक्षित हैं। सेना के सेवानिवृत्त कप्तान ने इस संग्रहालय में रखे सामानों से जुड़े इतिहास को बड़ी खूबसूरती से व्याख्यायित किया। उन सामग्रियों को देखते हुए जहाँ एक ओर कुमाऊँ रेजीमेंट के सैनिकों पर गर्व हो रहा था वहीं दूसरी ओर इस बात का भी एहसास हो रहा था कि आजादी से पहले ब्रिटिशों की सेना का अंग बनकर, आजादी के बाद भारतीय सेना का अंग बनकर, युद्ध में शहीद होकर या फिर जीत का सेहरा पहनकर इन सैनिकों ने जीवन में कैसे अनुभव इकट्ठे किए होंगे? उन अनुभवों में दर्द, निर्ममता, अपनों से दूरियों का पूरा का पूरा काफिला होगा। कितना अच्छा होता अगर विश्व के तमाम देश शान्ति या अमन रखने के लिए दोस्ताना रिश्ते रखते और सैनिकों की यह विपुल ऊर्जा देश को उन्नत बनाने के काम में ही खर्च हो पाती। सैनिकों की ऊर्जा का ऐसा प्रयोग मुझे रानीखेत के मनोकामनेश्वरी मन्दिर और गुरुद्वारे में दिखा।
रात्रिभोज के लिए मिथिलेश और मेनका के घर निमंत्रण था। उनके ही कारण जी.डी. बिड़ला विद्यालय का परिसर देखने का मौका मिला। संथ्या के वक्त उनके घर पहुँचते ही अपनत्व का एहसास हमें घेरने लगा था। उसी विद्यालय की एक शिक्षिका और शिक्षक भी हमारा साथ देने वहाँ मौजूद थे। पुरानी यादों को ताज़ा करने वाली बातों और हँसी ठहाकों के बीच कब संध्या से रात हो गई पता ही नहीं चला। रात्रि भोज को अपनत्व ने और भी स्वादिष्ट बना दिया था। लौटते वक्त परिसर में मौजूद तमाम खास स्थलों से हमारा परिचय करवाते हुए मिथिलेश और मेनका हमें गेस्ट हाउस तक छोड़ने आए। अगले दिन हमें कौसानी के लिए निकलना था। मिथिलेश-मेनका के घर अगले दिन नवमी की कुमारी पूजा थी। पूजा की तमाम व्यस्तताओं के बीच भी मिथिलेश अगले दिन हमारे साथ गॉल्फ क्लब चलने की इ्च्छा जाहिर करके गए।

रानीखेत के जंगल का सौंदर्य ही अलग था। इस सौंदर्य को और गहराई से महसूस करने मैं अपने परिवार के साथ सुबह की सैर पर निकल पड़ी। जी.डी. बिड़ला विद्यालय के परिसर से दो किलोमीटर की दूरी पर दुर्गा का मंदिर था। मिथिलेश से सुना था कि यहाँ उनका अक्सर जाना होता है। पहाड़ की गोद में पेरूल वृक्षों के वन के बीच बसे मंदिर को देखने की बहुत चाहत थी। सुबह हम इसी मन्दिर की ओर चल पड़े। सर्पीले मोड़ों वाला रास्ता, पेरूल वृक्षों के खूबसूरत जंगल का सौंदर्य और पक्षियों का कलरव एक स्वर्गीय वातावरण तैयार कर रहा था। पहाड़ की गोद में बसे हरड़ा देवी मंदिर (दुर्गा मंदिर) पहुँचते ही पंडित जी ने अपनत्व के साथ भीतर आकर टीका लगाने और प्रसाद लेकर जाने का आग्रह किया। मन्दिर के वातावरण में अद्भुत शांति थी। उसी दिन हमें कौसानी के लिए निकलना था। इसलिए वहाँ थोड़ी देर और रुकने की इच्छा होने के बावजूद भी वहाँ से निकलना पड़ा।रानीखेत से कौसानी जाने का पल हाज़िर था। मिथिलेश भी गॉल्फ क्लब तक हमारा साथ देने के लिए पहुँच चुका था। दूर तक फैले हरे मैदान में बातें करते हुए चलना और छाँव देखकर बैठना एक खूबसूरत अनुभव था। मिथिलेश को अलविदा कहने का समय आ गया था। इस सफर के स्मृति चिह्न के रूप में उसके द्वारा दिए गए पेरूल वृक्ष का फल साथ लेकर हम कालिका देवी मन्दिर की ओर रवाना हुए। बरसों पुराने इस माँ दुर्गा और काली माँ के मन्दिर के वातावरण में अजीब-सी शान्ति थी। यह हजार साल पुराना सिद्ध पीठ है। सिद्ध पीठ अर्थात वह जगह जहाँ किसी ने तपस्या के जरिये सिद्धी हासिल की थी। यहाँ दोनों मंदिर में पुरोहित की भूमिका स्त्रियाँ निभा रही थीं। मंदिर में एक माता जी की भी मूर्ति थी। संभवत: उन्हीं ने इस स्थान पर सिद्धि हासिल की थी। उनकी तपस्या का फल ही मानो हवाओं में घुलकर वातावरण को शान्तिमय बना रहा था।

कौसानी जाने का सफर शुरू हो चुका था। इस सफर पर कुछ खूबसूरत नजारों ने मन को गहराई से छू लिया। गगस नदी की चंचल धारा और लोद सोमेश्वर की घाटी का सौंदर्य भुलाए नहीं भूला जा सकता था। दोनों ओर पहाड़ से घिरी समतल खेती की जमीन जिस पर धान के फसल की कटाई हो रही थी और पास ही में बहती चंचल पहाड़ी नदी की शोभा ही निराली थी। खूबसूरत नज़ारों का आनंद उठाते हुए हम कौसानी बेस्ट इन आ पहुँचे। इस जगह की पुराने बंगले के लहजे की सजावट और सलीके से लगाए गए पौधों के सौंदर्य ने सबसे पहले हमारा ध्यान खींचा। लेकिन कमरे में पहुँचकर वहाँ से बाहर का नज़ारा देखते ही मानो मन किसी दूसरी दुनिया में ही खो गया। घाटी के समतल में बसे घर और पहाड़ एक साथ दिख रहे थे। समतल पर सुनहरी धूप थी तो पहाड़ों पर मेघ की छाया। ऐसा अद्भुत नज़ारा मैंने पहले कभी नहीं देखा। मन इस गेस्ट हाउस के बरामदे में बैठकर घंटों इस सौंदर्य को निरखना चाहता था। लेकिन समय की कमी का ध्यान रखते हुए सुमित्रानंदन पंत संग्रहालय और अनासक्ति आश्रम के लिए रवाना होना पड़ा।

भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान से नवाज़े गए हिन्दी के कवि सुमित्रानंदन पंत के जन्म-स्थान पर पहुँचकर मन जैसे वहाँ की प्राकृतिक शोभा में खो ही गया। कौसानी स्थित उनके जन्मस्थान पर आये बगैर इस बात को गहराई से महसूस ही नहीं किया जा सकता कि उनकी रचनाओं में प्रकृति को खास स्थान क्यों मिला। केवल छायावाद के कवि होने के नाते उनकी कविताओं में प्रकृति का महत्वपूर्ण स्थान है, इस बात पर यहाँ आने के बाद विश्वास करना मुश्किल है। इस संग्रहालय की देखरेख का दायित्व उत्तराखंड का संस्कृति विभाग निभा रहा है। संग्रहालय में आने वाले लोगों को काण्डपाल जी बड़े अपनेपन के साथ पंत जी के जीवन से जुड़ी तस्वीरें दिखाते हैं। उन्होंने हमें पंत जी का पुस्तकालय दिखाया। इस पुस्तकालय की खिड़की से पहाड़ों का दृश्य दिखता है। यहाँ आकर महसूस हुआ कि ऐश्वर्यमयी प्रकृति की गोद में पलने बढ़ने वाले इस कवि को प्रकृति से इतना प्रेम क्यों था?

कौसानी में सन् 1929 में गांधीजी सर्व भारत की यात्रा पर निकलकर विश्राम लेने रुके थे। यहाँ बर्फ से ढँकी त्रिशूल, नंदा देवी और अन्य कई पर्वतों की चोटियाँ देखकर वे मुग्ध हो गए। और यहाँ चौदह दिनों तक रुके। इस जगह को उन्होंने ’भारत का स्वीट्जरलैंड’ कहा। जहाँ गांधीजी रुके थे उसी जगह पर आज अनासक्ति आश्रम है। यहाँ गाँधी जी के जीवन और स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका से संबंधित तस्वीरों का संग्रहालय है। इस स्थान से दूधिया सफेद पहाड़ों की चोटियाँ देखते हुए मन नहीं भरता।ऊँची चोटियों वाली बर्फ से ढँकी दूधिया पर्वत श्रृंखला का दृश्य देख पाना सौभाग्य की बात है। जब हम कौसानी पहुँचे तब यह दृश्य मेघों के पीछे कहीं छिपा था। और हम ईश्वर से अगले दिन सुबह इन श्रृंखलाओं को मेघमुक्त कर दने की प्रार्थना कर रहे थे। पता ही नहीं चला कि कैसे समय बीत गया। संध्या होते ही घाटी में स्थित घरों की रोशनी टिमटिमाने लगी। गेस्ट हाउस से यह नजारा ऐसा दिख रहा था मानो जमीन पर तारे टिमटिमा रहे हों। मैं घंटों इसी दृश्य को निहारती रही। रात होने से पहले दूर के पहाड़ों के आसमान पर काले बादल मँडराते हुए दिखे थे। मन में एक आस बँध गई थी कि आज अगर वहाँ जमकर बरसात हो तो कल दूधिया सफेद चोटियाँ दिख सकती हैं।

जिस सपने को मन में लेकर मैं रात को सोई थी दिन में वह सपना पूरा हो गया। सूरज निकलते ही त्रिशूल, नंदा देवी और अन्य छोटी बड़ी बर्फानी चोटियाँ चमकती हुई दिखाई दी। सूरज की रोशनी से ये चोटियाँ चाँदी की तरह चमक रही थीं। इस अद्भुत दृश्य को मैं घंटों बैठकर देखते रहना चाहती थी। लेकिन वक्त इस बात की इजाजत नहीं दे रहा था। हमें अपने अगले मुकाम मुन्सियारी तक पहुँचना था। यहाँ से लगभग आठ, नौ, घंटों का रास्ता था।

हम मुन्सियारी के लिए निकल पड़े। लेकिन बर्फ से ढँकी वह पर्वत श्रृंखला दूर तक मानो हमारे साथ चलती रही।पहाड़ी नदी की चंचलता मुझे हमेशा से आकर्षित करती रही हैं। इस सफर में भी गोमती नदी न जाने किस मोड़ से हमारे साथ चलती हुई दिखाई दी। उसी के साथ चलते-चलते हम बैजनाथ मंदिर तक पहुँच गए। गोमती नदी के किनारे बसा यह मंदिर कत्यूरी वंश के शासकों ने बारहवीं सदी में बनाया था। पत्थरों से बना यह मंदिर मानो हमें थोड़ी देर के लिए प्राचीन युग में ले गया। काले पत्थर की मूर्तियों में प्राचीनता का रंग घुला हुआ था। मंदिर की सीढ़ियाँ नीचे झील तक उतर गई थीं। यहाँ भी नैनी झील की तरह ही मछलियाँ राजी खुशी से रहती हैं। यहाँ आने वाले उनको खाना खिलाते हैं। मंदिर के प्रांगण से बर्फीले पहाड़ की चोटियाँ दिख रही थीं। पूरे वातावरण से अद्भुत सौंदर्य टपक रहा था।बैजनाथ मंदिर को पीछे छोड़कर अब हम मुन्सियारी की तरफ बढ़ रहे थे। बैजनाथ में जाकर गोमती और सरयू नदी का संगम नज़र आया। यहाँ से गोमती को पीछे छोड़ते हुए हम सरयू नदी के साथ चल पड़े इस नदी के जल का रंग हल्का हरा है। चपलता के साथ यह नदी हमारे साथ दूर तक चली। मुन्सियारी तक का सफर बहुत लम्बा सफर था। कभी हम किसी पहाड़ के ऊपर चढ़ रहे थे तो कभी दूसरे पहाड़ में जाने के लिए नीचे की ओर आ रहे थे। यूँ ही चलते-चलते मैंने देखा कि अब राम गंगा नदी हमारे साथ चल रही है। इसी सफर में कपकोर्ट पहुँचकर एक चेकपोस्ट से हम गुजरे इस चेकपोस्ट पर वन विभाग का साइन बोर्ड लगा था। यही वह रास्ता था जहाँ से पिंडारी ग्लेशियर की ओर ट्रेकिंग के लिए जाया जाता है। यहाँ खड़े दो व्यक्ति ने हमारी गाड़ी रोककर रेजिस्ट्रेशन करवाने के लिए पैसे माँगे। जब उनसे रेजिस्ट्रेशन करवाने का कारण पूछा गया और यह भी कहा गया कि हम ट्रेकिंग के लिए नहीं जा रहे तब भी वे लम्बे समय तक तर्क करते रहे। उनके पास न वाजिब कागज था और न ही वाजिब तर्क। ट्रेकिंग करने वाले और पर्यटक दोनों ही इस रास्ते से गुजर रहे थे और ड्राइवर के अनुसार कुछ दिनों पहले भी यहाँ रेजिस्ट्रेशन की कोई गुंजाइश नहीं थी। संभवत: रास्ते की खासियत को देखते हुए इस इलाके के उन व्यक्तियों ने आमदनी का रास्ता खोज लिया था। इस घटना के बाद मेरे मन में अचानक ही यह ख्याल आया कि देवभूमि कहे जाने वाले राज्य में यदि ऐसी वारदातें होंगी तो इंसानियत बौनी होती रहेगी।

मुन्सियारी पहुँचने तक मौसम खराब हो चुका था। आसमान में बादल थे और छिटपुट बारिश हो रही थी। ऐसे मौसम में हम मुन्सियारी में विजय माउन्ट व्यू पहुँचे। यहाँ से बर्फ से ढ़ँकी पंचचूली की चोटियाँ साफ दिखाई देती हैं। लेकिन मौसम खराब होने के कारण बादल हमारे साथ आँख मिचौली खेलते रहे थे। अगले दिन सुबह हम नन्दा देवी मन्दिर गए। हम जानते थे कि पंचचूली की पृष्ठभूमि में यह मंदिर बेहद खूबसूरत दिखता है। लेकिन वहाँ पहुँचकर भी मायूसी ही हाथ लगी। बादलों ने मानो पंचचूली की चोटियों को ढ़ँककर रखने का निश्चय कर रखा था। और प्रकृति के सामने हम बेबस थे। उस दिन रात को जमकर बरसात हुई और सुबह पंचचूली की बर्फ से ढ़ँकी चोटियाँ सूरज की किरणों के पड़ते ही चाँदी की तरह चमकने लगी। उसी दिन हमें मुन्सियारी से कसार देवी के लिए रवाना होना था। रवाना होने से पहले पंचचूली की चोटियों को देखना ईश्वर के दर्शन करने के बराबर था। मैं संतुष्ट थी कि प्रकृति ने हमें मायूस नहीं किया। हम कसार देवी के लिए रवाना हो चुके थे।रास्ते में ही हम मुन्सियारी के कालामुनि टॉप पर उतरे। कालामुनि ने यहाँ साधना की थी। इस जगह से पंचचूली की चोटियाँ साफ दिखाई दे रही थीं। जैसे-जैसे हम कसार देवी की ओर बढ़ते रहे वैसे-वैसे पंचचूली की चोटियाँ पीछे छूटती गईं।

पहाड़ी गाँव में स्थित कसार देवी मंदिर दो हजार वर्ष पुराना है। यह क्षेत्र पाईन और देवदारू का घर है। यहाँ से हिमालय की बंदरपूछ चोटी दिखाई देती है। सन् 1890 में स्वामी विवेकानन्द को यहाँ गहन आध्यात्मिक अनुभूति हुई थी। अपनी खासियत के कारण यह क्षेत्र कई विदेशियों और भारतीयों को आकर्षित करता रहा है।अल्फ्रेड सोरनसेन (शून्यता बाबा), अर्नस्ट हॉफमैन (जो बाद में लामा गोविन्दा कहलाया) ने यहाँ साधना की। इस इलाके ने हिप्पी आंदोलनकारियों को भी पनाह दी है। माँ आनंदमयी, मनोवैज्ञानिक तिमोथी लियरी, बॉब डायलन, जॉर्ज हैरीसन, कैट स्टीवेन्स, पाश्चात्य बौद्ध राबर्ट थुरमन, लेखक डी.एच. लारेंस ने भी इस क्षेत्र में समय बिताया। कसार देवी मंदिर विशाल भू चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित होने के कारण नासा के वैज्ञानिकों के लिए खास हो उठा है। यह मंदिर बैन एलेन बेल्ट के अंतर्गत आता है। इस, बेल्ट के निर्मित होने के कारणों पर नासा शोध कर रहा है। विश्व में ऐसा उच्च भू चुम्बकीय क्षेत्र पेरू के माचू पिच्चू और इंग्लैण्ड केस्टोन हेन्ज में मिलता है। कसार देवी पहुँचने के साथ ही इस जगह कावैशिष्ट्य हमें आकर्षित करने लगा था। आँखें तो वही पहाड़ और वृक्ष देख रही थीं पर मन न जाने क्यों मंत्रमुग्ध हो गया था। यहाँ हम न्यू डोलमा में ठहरे थे। बौद्ध दम्पति का यह गेस्ट हाउस बड़ी खूबसूरत जगह पर स्थित है।

आसमान में मेघों का साया था। बर्फ से ढ़ँकी हिमालय की चोटियाँ नहीं दिख रही थीं लेकिन फिर भी मन मायूस नहीं था। एक अजीब-सी शक्ति मानो दिलों को बाँधे हुए थी।न्यू डोलमा गेस्ट हाउस के मालिक से पता चला कि बरसों पहले थोड़ा आगे चलकर पहाड़ के ऊपरी हिस्से में एक ब्रिटिश बंगला हुआ करता था। ब्रिटिशों से हस्तांतरित होते हुए यह एक ऑस्ट्रेलियन परिवार के हाथों में आया। आखिरकार यह परिवार गोविंद लामा के हाथों यह सम्पत्ति सौंपकर चला गया। बंगले से थोड़ा नीचे की ओर बौद्ध परिवार रहते हैं। वहाँ से लगभग 400 मीटर नीचे से कोसी नहीं बहती हैं। उन्हीं से पता चला कि सामने एक बौद्ध मोनास्ट्री भी है।

अगले दिन कसार देवी मंदिर के साथ ही हमने इन जगहों को भी देखने का निश्चय किया। अगले दिन सुबह होते ही हम कसार देवी मंदिर पहुँचने के लिए चढ़ाई चढ़ने लगे। इस गेस्ट हाउस से मंदिर पास ही था। और चढ़ाई भी थोड़ी-सी ही थी। मंदिर परिसर में कदम रखते ही मन शान्ति से भर गया। यहाँ की हवा में कुछ अलग बात थी। चोटी के करीब पहाड़ की ढलान पर खुला प्रांगण, प्रांगण में बैठने के लिए पक्की जगह और देवी माँ का छोटा-सा मंदिर जहाँ एक गुफा में माता की संगमरमर से बनी मूर्ति है। इस मंदिर से होते हुए सीढ़ियाँ ऊपर की ओर चली गई हैं। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हम शिव मंदिर तक पहुँचे। एक शिलालेख के अनुसार इस शिव मंदिर की स्थापना छठीं शती में दक्षिण भारत बेतिला के पुत्र रुद्र ने की थी। 2000 वर्ष पुराने इस मन्दिर का जिक्र स्कंद पुराण के इस श्लोक में भी मिलता है –
कौशिकी शाल्मली मध्ये पुष्य काषाय पर्वत:।
तस्य पश्चिम भार्गेव क्षेत्र विष्णो प्रतिष्ठितम॥
मंदिर में अद्भुत शान्ति थी। इस मंदिर के ठीक सामने ध्यान के लिए एक कमरा था ध्यान घर की फर्श मिट्टी से लिपी हुई थी। एक यज्ञ कुण्ड में त्रिशूल गड़ा हुआ था और दिया जल रहा था। छोटे से इस कमरे में ध्यान के लिए आसन बिछे हुए थे। वाकई यहाँ की हवा में घुले अनोखेपन को मैंने वहाँ थोड़ी देर के लिए ही ध्यान में बैठकर अनुभव किया। एक तो वातावरण की अनोखी शान्ति ऊपर से सूरज के साथ मेघों की आँखमिचौली और मेघों का वृक्षों को छूकर बहने की घटना का साक्षी होना एक अनोखा अनुभव था।
वक्त कैसे बीता पता ही नहीं चला।कसार देवी मंदिर से नीचे उतर कर हम बौद्ध मोनास्ट्री की ओर चल दिए। इसी ओर वह जगह भी थी जहाँ कभी पुराना ब्रिटिश बंगला हुआ करता था। डोलमा गेस्ट हाउस के मालिक ने हमें पुराने ब्रिटिश बंगले की तस्वीर दिखाई थी। उसकी जगह पर आज आधुनिक युग का बड़ा-सा मकान बना हुआ था। पुराना बंगला जंगल के बीच स्थित था। आज वहाँ पक्की सड़क बन चुकी थी। इस जगह के आकर्षण से मन को मुक्त करके मैदानों में लौटने की बात सोचना मुश्किल था। लेकिन इस जगह को अलविदा कहने का वक्त आ गया और मन में इस देवभूमि में दोबारा आने के संकल्प के साथ हम पहाड़ों को पीछे छोड़ते हुए काठगोदाम रेलवे स्टेशन की ओर चल दिए।

मई-जून की छुट्टियों में मन को तरोताजा करने के लिए प्रकृति में रमकर समय बिताने की आदत अब गहरी चाहत बन गई थी। इस साल मई-जून की कार्यसूची इस चाहत को पूरा करने की इजाजत नहीं दे रही थी। लेकिन गर्मियों की छुट्टी में प्रकृति के साये में वक्त बिताकर मन की बैटरी को चार्ज करना भी जरूरी थ। जहाँ चाह वहाँ राह के न्याय से अप्रैल के महीने में गुड फ्राइडे, बांगला नया साल का प्रथम दिन और रविवार का एक के बाद एक पड़ना हमें एक और प्राकृतिक अनुभव हासिल करने का मौका दे गया। बंगाल के सौंदर्य को अलग-अलग प्राकृतिक स्थलों में वक्त बिताकर महसूस करने का सिलसिला तो हमने बहुत पहले ही शुरू कर दिया था। इस बार उसी कड़ी में एक और नाम हल्दिया का जुड़ गया। इस सफर पर जाने के लिए विशेष तैयारी की जरूरत नहीं थी। घर से ही अपनी गाड़ी में जरूरत का सामान लेकर हमने हल्दिया के लिए लांग ड्राइव आरंभ की। जाना पहचाना नेशनल हाइवे सोलह का मसृण रास्ता पकड़ते ही मन शहरी भीड़ भाड़ से मुक्ति के पल महसूस करने लगा था। गंगा नदी और कोलाघाट में रूपनारायण नदी को पार करके गाड़ी हल्दिया की ओर बढ़ रही थी। कोलाघाट पार करते ही रास्ते के दोनों ओर लगे वृक्षों का घनत्व बढ़ गया था। जिसके चलते वन्यता का रंग हवा में घुल रहा था। उस पर आने और जाने के रास्तों के बीच के विभाजक स्थल में बेतरतीब उगे झाड़ झंखाड़, कहीं फूलों के वृक्ष तो कहीं बड़े पेड़ इस वन्यता को और बढ़ा रहे थे। इस तरह आगे बढ़ते हुए दूर से जहाज के लंगर के आकार का हल्दिया का प्रवेश द्वार दिखा। हुगली और हल्दी नदी के संगम स्थल पर पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले में बसे इस शहर में जहाँ हरियाली दिखी वहीं बड़े जहाज, नाव, माल उठाने वाले क्रेन भी दिखे। यहाँ पेट्रो केमिकेल फैक्ट्री में कार्यरत लोगों के रहने के लिए कई टाउनशिप सुनियोजित ढंग से बने हुए थे। रास्तों के दोनों ओर लगे पाम के वृक्ष रास्ते की शोभा बढ़ा रहे थे। जमीन से कुछ ऊँचाई तक सफेद रंग से रंगे पेड़ के तने खूबसूरती को बढ़ा रहे थे। देखते ही देखते हमारी गाड़ी हल्दिया भवन प्रांगण में प्रवेश कर गई।
सुना था हल्दिया के सौंदर्य को अगर गहराई से महसूस करना हो तो हल्दिया भवन में रहना जरूरी है। इस बात का अहसास यहाँ पहुँचते ही हो गया। रंग बिरंगे फूलों से सजे लॉन, भवन से नदी को जोड़ने वाले एक छोटे से कच्चे रास्ते और उस रास्ते के खत्म होते ही नदी के विस्तृत वक्षस्थल को भवन के बरामदे से निरखना एक अनोखा अनुभव था। बरामदे से ही नदी के समांतर बने रास्ते के किनारे लगे पाम के वृक्ष और दो वृक्षों की दूरी पर बैठने के लिए बने बेंच दिख रहे थे। बड़े-बड़े जहाजों को यहीं बैठकर गुजरते हुए देखने का मंजर भी रोमांचक था।
कोलकाता पोर्ट के कार्यभार को हल्का करने के लिए बना हल्दिया डॉक कॉमप्लेक्स हल्दिया शहर के विकसित होने का मूल कारण है। अंग्रेजों ने अपने औपनिवेशिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही कोलकाता पोर्ट को विकसित किया था। लेकिन आजादी के बाद इस जगह का प्रयोग देश के विकास के उद्देश्य से होने लगा। हल्दिया केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि पूरे पूर्व भारत में तेजी से उभरने वाले औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है। पेट्रो केमिकल उद्योगों से भरे इस जगह को हुगली और हल्दी नदी के संगम और देवदारू, पाम और अन्य कई बड़े-बड़े वृक्षों के साये ने अनोखी शोभा से भर दिया है। उस पर हल्दिया भवन के आस-पास के इलाके की निर्जनता ने यहाँ के वातावरण को संगीत से भर दिया है।
हालांकि गर्मी ने दरवाजे पर दस्तक दे दी थी फिर भी बंगाल की खाड़ी के करीब का यह इलाका जल की नमी से भरी हवा के कारण ठंडक को संजोए हुए था। ऐसे वातावरण में घने पेड़ों के बीच से कोयल का कूकना एक मनोरम अनुभव था। ऐसे मौसम में हम सूर्यास्त का खास अनुभव प्राप्त करने के लिए बालूघाट की ओर रवाना हुए। नदी के समांतर दूर तक चले गए रास्ते पर ही वह स्थल था जहाँ से सूर्यास्त का सौंदर्य बड़ी शिद्दत से महसूस करना संभव था। उस जगह तक पहुँचने से पहले ही हल्दी नदी के ही किनारे बसे बड़े-बड़े मत्स्य पालन के जलाशय थे। मिट्टी की एक दीवार हल्दी नदी और इस जलाशय के बीच विभाजक का काम कर रही थी। इस जलाशय में कुछ चरखे चलते हुए दिखाई दिए। दरअसल छोटी मछलियों में पानी से ऑक्सीजन खींचने की क्षमता कम होती है। पानी में विद्युत के जरिए जब चरखे चलते हैं तो उसमें कंपन पैदा होता है। यह कंपन छोटी मछलियों के बढ़ने के लिए आवश्यक स्थिति प्रदान करता है। रास्ते के दोनों ओर बने जलाशय और जलाशय के उस पार हल्दी नदी का नजारा आँखों को ठंडक दे रहा था। लहरों की कल कल आवाज के बीच ठंडी हवा का बहना और रास्ते के किनारे बने बेंच पर बैठकर नदी की पृष्ठभूमि में क्रमश: लाल होते हुए डूबते सूरज को देखना एक अविस्मरणीय पल था।
सूर्यास्त के बाद हम हल्दिया मेरीन ड्राइव पहुँचे। हल्दी नदी के किनारे बसा यह स्थल यहाँ रहने वालों के लिए भी एक विशेष आकर्षण केन्द्र है। रास्ते के किनारे एक पंक्ति में खड़े पाम के वृक्ष, सजीली रोशनी, जगह-जगह पर बनी खूबसूरत मूर्तियाँ और बैठने की खूबसूरत व्यवस्था ने इस जगह में एक अलग सौंदर्य भर दिया है। मेरीन ड्राइव के अंत में बना पार्क भी इस इलाके का एक विशेष आकर्षण केन्द्र है। सुबह शाम यहाँ लोग नदी की ताजी हवा खाने आते हैं। प्रकृति की यह अद्भुत देन यहाँ के लोगों को मिला एक उपहार ही है। यहाँ से उस पार नन्दीग्राम का तट दिखाई दे रहा था। कुछ साल पहले नन्दीग्राम का नाम सुनते ही जो भयानक छवि आँखों के सामने उभर आती थी आज के अनुभव ने उस छवि की जगह प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर एक नई छवि बना दी थी। इस जगह को सूरज की रोशनी में एक बार फिर देखने की चाह को मन में भरकर हम हल्दिया भवन रवाना हुए।
हल्दिया भवन पहुँचते ही संगम स्थल से आ रही तीव्र रोशनी ने हमारा ध्यान खींचा। यह रोशनी नदी के किनारे खड़े हुए विशालकाय जहाज से आ रही थी। पूछने पर पता चला कि ऐसे जहाज हल्दिया स्थित तीसरी तेल जेट्टी पर बंबई से तेल लेकर आते हैं और पाइप लाइन के जरिए तेल को गंतव्य स्थल तक पहुँचाकर वापस लौट जाते हैं। जहाज की उस रोशनी को देखकर अनायास ही विद्यालय में पढ़े अध्याय ’टाईटेनिक’ की याद आ गई। हल्दिया भवन के ठीक सामने नदी के किनारे बने बेंच पर बैठकर उस जहाज की रोशनी को लहरों की आवाज सुनते हुए निरखना बेहद सुखद था। उस पर जल से नम हुई गर्मियों के मौसम की हवा उस क्षण को और भी मनोरम बना रही थी।
हल्दिया की खूबसूरती को और भी गहराई से महसूस करना हो तो सुबह पांच बजे तक सुबह की सैर पर निकल पड़ना जरूरी है। इसी निश्चय के साथ हम अगले दिन सुबह-सुबह सैर पर निकल गए। हल्दिया टाउनशिप के चौड़े मसृण रास्ते और सजीला हरा वातावरण मानो सुबह की हवा के साथ मन में रिस रहा था। चलते हुए हम फिर मेरिन ड्राइव के सौंदर्य को सूरज की रोशनी में निरखने के लिए वहाँ पहुँच गए। छटे हुए घास के लॉन के बीच नदी के किनारे कतार से लगे पाम वृक्ष और बैठने के लिए पक्के बेंच उस पर नदी को छूती हुई आती तेज हवा ने हमे खामोश होकर इस वक्त की तस्वीर और अहसास को मन में संजोने के लिए मजबूर कर दिया। कुछ आगे चलकर नगरपालिका द्वारा नदी के किनारे टाइल्स से बनाए गए फुटपाथ और जगह-जगह बनी मूर्तियाँ थीं। लेकिन उस कृत्रिम सौंदर्य से कहीं ज्यादा आकर्षक था छटे घास का नैसर्गिक लॉन। आगे चलकर जेट्टी थी जहाँ मछुवारे रोज नयाचर या मीन द्वीप से मछली लेकर बेचने आते हैं। साथ ही नन्दीग्राम आने जाने वाले भी इसी जेट्टी का प्रयोग करते हैं। पर्यटकों को मीन द्वीप तक जाना हो तो मछुवारों के नाव में ही जाना पड़ता है। बांगला में नदी द्वारा बहा कर लाई गई मिट्टी के जमने से बनने वाले भूखंड को ’चर’ कहते हैं। यह द्वीप काफी पुराना नहीं है। इसलिए इसे ’नयाचर’ कहते हैं। यह द्वीप आज ’चींगड़ी’ नामक मछली के सर्वाधिक उत्पादन के लिए विश्व में प्रसिद्ध है। इसी वजह से संभवत: इसे ’मीन द्वीप’ भी कहते हैं।
हमारी किस्मत हमें पहले दिन से ही बार-बार हल्दिया डॉक कॉमप्लेक्स के सेवानिवृत्त सज्जन श्रीपतिचरण दास से मिला रही थी। पहले दिन ही शाम को मेरीन ड्राइव की सैर करते हुए हमने उनसे नयाचर के बारे में पूछा था। अगले दिन सुबह उन्हें फिर मरीन ड्राइव में सैर करते हुए पाया। उनसे रामकृष्ण मिशन द्वारा परिचालित मुक्तिधाम मन्दिर का रास्ता पूछते ही उनके व्यक्तित्व का समाज सेवी पहलू उभर कर सामने आया। रामकृष्ण मिशन से जुड़कर वे सत्रह साल सेवा निवृत्त जीवन व्यतीत करने के साथ-साथ समाज सेवा का कार्य भी कर रहे थे। ताजी हवा और सेवा कार्य में मन को रमाए रखने के कारण ही शायद उन्हें देखकर उनकी उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल था। मुक्तिधाम मन्दिर के बारे में पूछते ही उन्होंने न सिर्फ रास्ता बताया बल्कि उनकी पत्नी की अंतरंग सहेली काजल दी से भी संपर्क करके उन्हें बताया कि हमारी आज उस मन्दिर में जाने की योजना है। काजली दी मुक्तिधाम मन्दिर के बगल में स्थित शारदा मिशन की सन्यासिनी हैं। सन्यास के बाद उन्हें प्रेमानन्दमयी नाम दिया गया। इस अद्भुत सन्यासिनी से मिलने का सौभाग्य भी हमें श्रीपति जी से मिलने के कारण ही प्राप्त हो पाया।
सुबह का नाश्ता करके ही हम नहा धोकर मुक्तिधाम मन्दिर के लिए रवाना हुए। इस बीच प्रेमानन्दमयी माँ से भी फोन पर बात हो गई थी। मुक्तिधाम मन्दिर हल्दिया भवन से लगभग 21 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वहाँ पहुँचते ही दक्षिण भारत के लहजे पर बने नक्काशीदार सफेद गेट ने हमारा ध्यान खींचा। गेट का फाटक किसी राजमहल के फाटक जैसा था। फाटक से प्रवेश करते ही रास्ते के बीचोबीच और दोनों तरफ देवदारू के सजीले छटे हुए पेड़ नजर आए। उस फाटक से प्रवेश करने का अनुभव किसी राजमहल में प्रवेश करने के अनुभव से कम नहीं था। कुछ दूरी तक चलकर बाईं ओर प्रार्थना गृह स्थित है, जो थोड़ी ऊँचाई पर है। प्रार्थना गृह में राधाकृष्ण और काली माँ और हनुमान जी की मूर्तियाँ हैं। इस गृह का परिवेश ध्यान के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। इस प्रार्थना गृह के बरामदे से एक गुफा नजर आती है जिसके ऊपर शिवजी का मन्दिर है। मुक्तिधाम मन्दिर के विशाल प्रांगण की सैर करते हुए हम ठीक उसके विपरीत स्थित शारदा मिशन सेवाश्रम पहुँचे। वहाँ हमें प्रेमानन्दमयी माँ हमारा इन्तजार करती हुई मिली।
प्रेमानन्दमयी माँ से शारदा मिशन सेवाश्रम का इतिहास सुनकर उनके प्रति और इस आश्रम के प्रतिष्ठाता भक्ति चैतन्य जी के प्रति हमारा श्रद्धा भाव उमड़ पड़ा। लगभग उन्नीस सौ साठ के आसपास भक्ति चैतन्य ने सेवा भाव से प्रेरित होकर ही गाँव के बच्चों खास कर लड़कियों को शिक्षा देने के उद्देश्य से बड़ी लगन से एक विद्यालय को चालू करवाया। लेकिन काफी क्लेश का सामना करके वे उस विद्यालय से खुद को अलग करने के लिए मजबूर हो गए। लड़कियों की शिक्षा का प्रबंध करने की धुन उन पर सवार थी। इसी धुन ने उन्हें शारदामनी बालिका विद्यालय की स्थापना करने के लिए प्रेरित किया। प्रेमानन्दमयी माँ इसी विद्यालय की छात्रा थी और सेवाभाव उनमें इस तरह कूट-कूट कर भर गया था कि महिषादल में स्थित अपना घर छोड़कर उन्होंने सन्यासिनी जीवन अपना लिया। आज शारदा मिशन सेवाश्रम लगभग सत्रह नेत्रहीन बालिकाओं को कारीगरी की शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ सौ से भी अधिक नेत्रहीन विद्यार्थियों को बालिका विद्यालय में शिक्षा भी प्रदान कर रहा है। कुल चार सन्यासिनें और चार ब्रह्मचारिणियाँ मिलकर इस आश्रम को संभालती हैं। इतना ही नहीं आश्रम के बालिकाओं की नेत्र संबंधी समस्याओं को देखते हुए इसी आश्रम के प्रयास से एक नेत्र अस्पताल भी यहाँ खुल गया है। सेवाकार्य के प्रथम प्रयास में क्लेश पाकर भक्ति चैतन्य जी निराश होने के बजाय दुगनी उर्जा से सेवा कार्य में लग गये थे। उस प्रयास का फल उनके द्वारा प्रतिष्ठित विवेकानन्द मिशन आश्रम, शारदा मिशन सेवाश्रम, नेत्र अस्पताल, विवेकानन्द मिशन मन्दिर, विवेकानन्द मिशन महाविद्यालय, शिक्षायतन भव्य रूप में हमारे सामने खड़ा था। प्रेमानन्दमयी माँ के उष्णता पूर्ण स्वागत और सहजता ने हमारा मन मोह लिया। हमने नेत्रहीन बालिकाओं द्वारा बनाई जाने वाली वस्तुओं और उनके कार्य स्थल को भी देखा। उन्हीं से यह जानकारी मिली कि शेक्सपीयर सरणी स्थित ऋषि अरविन्द भवन यहाँ की बालिकाओं द्वारा बनायी गए वस्तुएँ खरीद लेता है। इसी के चलते इस गाँव में भी इस तरह का कार्य चला पाना संभव हो पा रहा है। इतना ही नहीं समय-समय पर कई धनी व्यक्तियों ने दान के जरिए इस आश्रम के विकसित होने में गहरा सहयोग दिया है। मानव संसाधनों की कमी और आर्थिक सहयोग की अनिश्चितता के बीच प्रेमानन्दमयी माँ इस अखंड विश्वास के साथ हमेशा चिन्तामुक्त रहती हैं कि जब इस जगह को बचाए रखने की जिम्मेदारी ईश्वर की है तब हमारे चिंतित होने का कोई मतलब ही नहीं बनता।
पहले दिन बालूघाट से लौटते हुए हम एक जाऊ वृक्ष का वन देखकर रुक गए थे। उसी वन से होकर एक कच्चा रास्ता सीधे नदी तक पहुँच गया था। निर्जनता, वन्यता, खामोशी, नदी का खूबसूरत नजारा एक साथ उस स्थान में खूबसूरत रंग घोल रहे थे। उस पर एक घने पेड़ के नीचे किसी ने शिवजी की एक छोटी-सी मूर्ति रख दी थी। नदी के किनारे शान्ति में डूबे वातावरण के बीच हवा के सरसराते हुए पेड़ों के बीच से गुजरने और उस पर नदी किनारे के खेतों के बीच एक घने पेड़ के नीचे शिवजी की मूर्ति प्राचीन युग का आभास दिला रही थी। हमारी इच्छा थी कि अगले दिन भी यहीं बैठकर सूर्यास्त देखें। लेकिन मेरीन ड्राइव के विद्यासागर पार्क में समय बिताने के कारण यहाँ फिर से आना नहीं हो पाया। इसी के साथ हल्दिया पत्तन के जहाजों को करीब से देख पाने की इच्छा भी समय की कमी के कारण स्थगित रह गयी। इन्हीं अधूरी इच्छाओं के कारण हम यहाँ से रवाना होने से पहले ही यह तय कर बैठे कि शीघ्र ही हल्दिया में हम अपने माता-पिता के साथ हाजिर होंगे।

नवंबर का महीना समाप्त होने के कगार पर था। सर्दियाँ मानो दहलीज़ तक पहुँचकर भी कोलकाता में प्रवेश करने से हिचकिचा रही थीं। हर साल दिसंबर में बड़े दिन की छुट्टियों में मन को प्रकृति की खुली हवा में रमाने की एक आदत से पड़ चुकी थी। लेकिन इस बार कुछ खास वजह से ऐसा करना संभव नहीं हो पा रहा था। इसलिए नवंबर के अंत में ही वर्धमान जिले के यमुनादिघि नामक स्थान पर जाने की योजना बनी। यहाँ राज्य मत्स्य उन्नयन निगम का आम्रपाली पर्यटन केन्द्र ही एकमात्र रहने की जगह है। इस जगह एक बार पहले भी जाना हुआ था। लेकिन न जाने क्यों उस वक्त यहाँ का वातावरण मेरे मन की गहराइयों को छू नहीं पाया था। गेस्ट हाउस का कमरा, समूचे स्थान में झलकती रख-रखाव की कमी और शाम ढलते ही निगलने वाला अँधेरा मन में ऐसा रिसा कि दोबारा वहाँ जाने का ख्याल भी मन में नहीं आया। लेकिन शान्तनु की निगाहों ने इस जगह को एक-दूसरे ही पहलू से देखा था। उसके मन में यहाँ की खुशनुमा छवि कुछ इस तरह रिस गई थी कि उस सफर के बाद वे यहाँ अपने दोस्त विप्लव के साथ दो-दो बार आकर रह चुके थे। उनके लिए यहाँ आना मन को तरोताजा करने का एक जरिया बन गया था। सुबह गाँव की सैर, धान के खेत के बीच से बनी पगडंडियों पर चलना, विशाल धान खेतों के बीच से गुजरी पक्की सड़क पर दूर तक चलना उनके जिंदगी के कुछ सुनहरे पल के रूप में अंकित हो चुके थे।
शांतनु और मेरी एक बात एकदम एक-सी है। दोनों ऐसी जगह जाना पसंद करते हैं जहाँ एक जगह पर बैठकर बहुत दूर तक प्रकृति का खुला प्रांगण दिखाई दे। सुबह सूरज उगने से पहले ही सैर पर निकल जाना और धूप चढ़ने से पहले गेस्ट हाउस में लौटकर वहाँ के लोगों से उस जगह की संस्कृति के बारे में जानना और कुछ पढ़ना और धूप की तीव्रता कम होते ही फिर सैर पर निकलकर शाम ढलने से पहले लौट आना और शाम ढलते ही जम कर अपने अध्ययन कार्य में डूब जाना। हमारे साथ निकलते-निकलते बेटी राशि को भी यही आदत पड़ गई थी। शहरों से दूर बसे गाँव हमें सबसे ज्यादा आकर्षित करते थे। यमुनादिघि के बारे में शांतनु के अनुभवों को देखते हुए मैंने एक और बार वहाँ जाना स्वीकार कर लिया। शान्तनु पिछली बार जिस कमरे में रुके थे हमें वही कमरा मिले इस बात का उन्होंने खास ढंग से ख्याल रखा। सुबह सात बजे हम नैहाटी से माँ तारा एक्सप्रेस पकड़ने के उद्देश्य से घर से रवाना हुए।
रेलगाड़ी से गुसकरा स्टेशन पर उतरकर सड़क मार्ग से सफर शुरू करते ही ग्राम्य जीवन के दृश्यों ने सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा। दोनों ओर फैले धान के खेत, जहाँ फसलों की कटाई हो चुकी थी और बीच से निकली पक्की सड़क जो टेढ़े-मेढ़े ढंग से बल खाती हुई दूर तक जाती हुई दिखाई दे रही थी। इन दोनों को एक साथ निरखना एक अनोखा अनुभव था।लगभग साढ़े ग्यारह बजे हम अपने गंतव्य स्थल यमुनादिघि के आम्रपाली पर्यटन केन्द्र पहुँचे। पर्यटन केंद्र के खुशमिजाज कर्मचारियों की मेजबानी में अनुभव का एक नया दौर शुरू हुआ।
यमुनादिघि एक बेहद बढ़ा जलाशय था। राज्य मत्स्य उन्नयन निगम ने इस जलाशय को मत्स्य पालन के लिए मिट्टी की दीवार खड़ी करके कुल चौबीस हिस्सों में बाँट दिया। हम कच्ची मिट्टी का रास्ता पकड़कर कई हिस्सों में बँटे यमुनादिघि में पक्षियों का कलरव सुनते हुए और इन पक्षियों की अपने शिकार को पकड़ने की अद्भुत कला देखते हुए काफी दूर तक निकल आए। आम, नारियल, गुलमोहर के वृक्षों से भरे इस स्थल में आँखों को खींच कर रखने की अद्भुत ताकत है। जलाशय के किनारों में कतार में लगे वृक्ष मानो मन को किसी स्वर्गीय लोक में आमंत्रित करते हुए से जान पड़ते हैं।
ऐड़ाल गाँव के इस यमुनादिघि जलाशय में कभी गाँव के लोगों का अबाध प्रवेश हुआ करता था। सर्दियों में अनगिनत पक्षी दूर देश से यहाँ उड़कर आया करते थे। इस बार यहाँ अधिक पक्षी न देखकर मैंने एक स्थानीय व्यक्ति से इसका कारण पूछा। पता चला कि पक्षी बहुत मछलियाँ खा जाती हैं इसलिए इन्हें उड़ाने के लिए यहाँ व्यक्तियों को नियुक्त किया गया है। वे बम या पटाखे की आवाज से इन्हें उड़ाते रहते हैं। वृक्षों का फल और जल की मछली ही इस संपत्ति से आमदनी के दो महत्वपूर्ण साधन हैं। मछलियों को बचाने के लिए पक्षियों को इस तरह उड़ाना स्वाभाविक था। लेकिन फिर भी मन को यमुनादिघि का पूरा चित्रपट पक्षियों की कमी के कारण अधूरा-सा लग रहा था।
सुरक्षा के प्रश्न को ध्यान में रखते हुए गाँव की ओर जलाशय के किनारे से दीवार उठा दी गई थी और ठीक उसके उल्टी तरफ जहाँ खेत थे वहाँ लोहे की तार लगाकर जलाशय तक पहुँचने के रास्ते को बंद कर दिया गया था। चलते-चलते हम जलाशय के उस छोर तक आ चुके थे, जहाँ लोहे के तारों के इस पार हम थे और उस पार पके सुनहले धान के खेत। कई खेतों में धान की कटाई हो चुकी थी। एक खेत में एक बड़ी-सी गाड़ी खेत से धान के पौधों को काटकर धान को उन पौधों से अलग कर दे रही थी। उसी गाड़ी में जोर-जोर से कोई फिल्मी गीत भी बज रहा था। यह दृश्य देखकर मन में अचानक ही यह ख्याल आया कि बहुत दिनों के बाद नागार्जुन को गाँव में आकर धान कूटती किशोरियों के जिस कोकिल कंठी तान को सुनने का सुख मिला था आज वह मंजर कहीं खो गया है। यंत्रों ने मनुष्यों और मनोरंजन के साधनों को किस तरह विस्थापित कर दिया है। गाँव में पलने-बढ़ने वाली नई पीढ़ी को भी आज धान कूटते हुए गाए जाने वाले लोकगीतों को सुनने का मौका नहीं मिल रहा। लोकगीतों के इस अनमोल विरासत को हम कहीं खोते जा रहे हैं। विश्वविद्यालय में लोक संस्कृति, लोकगीतों और लोक तत्वों पर न जाने कितने शोध-कार्य हुए और होते जा रहे हैं। मगर वो कोशिशें कहीं दिखाई नहीं देतीजो वर्तमान गाँवों के लोगों के होठों पर लोकगीत को बचाकर रख सके।
अगले दिन सुबह ऐड़ाल गाँव की ओर हम सैर के लिए सुबह-सुबह निकल पड़े। जलाशय के किनारे बनी दीवार एक जगह टूटी हुई दिखाई दी। यहाँ से होकर गाँव तक कम समय में पहुँचा जा सकता था। थोड़ी ही देर में हम लाल मिट्टी के उस कच्चे रास्ते पर आ गए जो ऐड़ाल गाँव की ओर जाता है। यह रास्ता थोड़ा ऊँचा रास्ता था। नीचे की ओर दूर तक फैले खेत थे। जिन पर गाड़ी से धान की कटाई चल रही थी। कुछ दूरी पर बड़े-बड़े जंगली पेड़ थे। इस जगह पर खड़े होकर कुछ समय के लिए लगा कि हम मैदान में नहीं किसी घाटी में खड़े हैं। इस रास्ते पर थोड़ी देर तक चलने के बाद ही कच्ची मिट्टी से बने घर दिखाई देने लगे। घरों के सामने बड़े-बड़े आंगन थे जहाँ धान को फैलाकर रखा गया था। धान के सूखे पौधों से ही धान रखने के लिए एक विशाल घर-सा बना हुआ था। धान रखने की यह जगह भी लोक शिल्प का एक खास उदाहरण कहा जा सकता है। गाँव वालों से ही पता चला कि धान को गाँव वाले इसके सूखे पौधों से बने आधार में तब तक रखते हैं जब तक इसके अच्छे दाम न मिले। धान, मुर्गियों और बत्तखों के अंडे, गाय और बकरी का दूध इस गाँव के लोगों के आजीविका कमाने के साधन हैं। गाँव में कई बड़े-बड़े पक्के मकान भी दिखे। साथ ही एक मस्जिद भी बनती हुई दिखी।
पिछली बार जब शान्तनु अपने दोस्त के साथ इस गाँव में आए थे तब एक व्यक्ति से भेंट हुई थी जिसका बेटा आई.आई.टी. का छात्र था। और एक व्यक्ति भी मिला था जिसका बेटा बैंगलोर में कार्यरत था। इस बात से यह साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि गाँव की नई पीढ़ी निश्चित रूप से शहरों की ओर भाग रही है। यदि कृषि क्षेत्र में अनुसंधान के जरिए बीज बोने से लेकर फसल काटने तक की पद्धति को अधिक से अधिक वैज्ञानिक और सुविधाजनक बनाया जाता तो किसान के बेटे कृषि कार्य को ही अत्याधुनिक साधनों के सहारे अधिक चाव लेकर करते। मैंने यह बेहद गहराई से महसूस किया कि कृषि प्रधान देश होने के नाते यह बहुत जरूरी है कि भारत में ऐसे हालात पैदा हों कि किसान का बेटा कृषि कार्य में ही अपने उज्जवल भविष्य का सपना देख सके।
गाँव में भी बड़े-बड़े तालाब दिखे। इन तालाबों में पक्षियों का दल जम कर अठखेलियाँ कर रहा था। यहाँ उन्हें रोकने टोकने वाला कोई नहीं था। सर्द मौसम की खिली हुई धूप थी और ऐसे में हल्की-हल्की शीतल हवा के बीच तालाबों में उमड़ते पक्षियों का खेल देखने का मजा ही खास था। तालाब के बगल में सोनाझुड़ी वृक्षों के वन में खड़े होकर हम एकटक तालाब और पक्षियों को देख रहे थे। प्रकृति का अपार वैभव मानो मन मस्तिष्क में आनंद का झरना बनकर बह रहा था। यमुनादिघि में तीसरे दिन सुबह हमने धान खेत के बीच से निकली पक्की सड़क पर दूर तक चलने का निश्चय किया। दूर तक फैली सुनहरी धानी जमीन और सिर के ऊपर नीला आसमान और उन दोनों के बीच दूर विभाजक की तरह खड़े हरे पेड़ों की श्रृंखला के बीच हम अपने आपको सृष्टि के कैनवास के अंग-सा महसूस कर रहे थे। नीचे जितनी दूर तक नजर जा रही थी सुनहरे रंग का विस्तार था और ऊपर आसमान की विशाल नीली चादर। राह चलते हुए एक ऐसे व्यक्ति से भेंट हुई जो फसल काटने के लिए गाड़ी भाड़े पर देने का कार्य करता है। उसी ने हमें बताया कि धान का पौधा जब गाड़ी के कटर के जरिए काटा जाता है तब उसी के भीतर बने एक खाने में धान जमा हो जाता है और पौधे का कटा हुआ हिस्सा बाहर निकल आता है। इस गाड़ी के चालक अक्सर पंजाब से आते हैं। जो एक महीना कार्य करने के लिए चालीस हजार लेते हैं। इंटरनेट के जरिए न्यूनतम दस हजार रुपये भेजकर उनसे कार्य करने की जबानबंदी ली जाती है। चालक के तीन वक्त का खाना-पीना और गाड़ी में संगीत की व्यवस्था तो आम बात है। धान की कटाई का काम आसान करने बाजार के रास्ते से आई आधुनिक गाड़ी अपने साथ फिल्मी संगीत की भी संस्कृति लेकर घुस आई। काश कि काम आसान करने वाली गाड़ी के साथ लोकगीत के कोमल तंतुओं का मेलबंधन हो जाता और गाँवों में धान कटाई का मौसम एक उत्सव की शक्ल ले पाता। इस सपने और आज की हकीकत के बीच की खाई को महसूस करके मुझे विश्वविद्यालयों में लोक संस्कृति पर होने वाले तमाम शोध कार्य अधूरे से लगने लगे। रह-रह कर मुक्तिबोध की यह बात याद आने लगी कि ज्ञान के दाँत जिंदगी की नाशपाती में गढ़ने चाहिए ताकि संपूर्ण आत्मा जीवन का रसास्वाद कर सके।
धरती का सुनहरा धानी चादर देखने के बाद मन में हरे परिधान में इसी धरती को देखने की ख्वाइश परवान चढ़ने लगी थी। इसी ख्वाइश ने हमें स्थानीय लोगों से यह पूछने को मजबूर किया कि किस महीने में यहाँ आने पर खेतों की हरियाली देखी जा सकती है। पता चला कि दुर्गा पूजा के दौरान इन खेतों में लहलहाती हरी धान की फसल देखी जा सकती है। अगर खेतों में कैनल के जरिए सिंचाई के लिए पानी छोड़ा जाए तो माघ के महीने में भी हरी फसल दिख सकती है। इस महीने के धान की खेती को यहाँ ’बोरो चाश’ कहते हैं। धान की यह फसल पूरी तरह से कृत्रिम सिंचाई की व्यवस्था पर निर्भर करती है। सीमित जल के कारण जिन ग्रामों को ’बोरो चाश’ के लिए जल नहीं मिल पाता उन ग्रामों की जमीन साल भर के लिए बेकार ही पड़ी रहती है। यमुनादिघि के गेस्ट हाउस के कमरे के बरामदे से दूर तक हमें जो खेत फैले दिखाई दे रहे थे उन खेतों को अगर बोरो फसल के लिए कैनलों के जरिए सिंचाई का जल न मिले तो वह साल भर खाली ही पड़े रहते हैं। यहाँ काम करने वाली एक महिला ने बताया कि अगर कैनल से पानी न मिले तो माघ के महीने में हरे चादर ओढ़े हुए खेत देखने आने की ख्वाइश पूरी न हो सकेगी। इस बात को सुनकर मन ख्वाइशों की गली से बाहर निकलकर एक ऐसी गली में जाकर दाखिल हुआ जहाँ मन में रह-रह कर यह सवाल उठने लगा कि दो-तीन महीनों में ही उन्नत फसल देने की क्षमता रखने वाले बीज आज उपलब्ध होने के बावजूद सिंचाई के लिए आवश्यक जल की अनुपलब्धता मिट्टी से सोना उगाने की राह में बाधक बनकर खड़ी हो रही है। खेतों तक जल पहुँचाने वाले कैनलों का बाँधों से संबंध बाँधों से कितना पानी किस राज्य को मिलेगा या नदी से कितना पानी किस देश को मिलेगा कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर किसानों का भाग्य निर्भर करता है। मन ने पहली बार यह महसूस किया कि अन्न उगाने वाले हमारे हकीकत के अन्नदाता किसानों के हाथ किस कदर बँधे हुए हैं। मेरे साथ बेटी राशि भी इस बात को समझ पा रही थी कि जो चावल मूल्य देकर बाजार से आसानी से मिल जाता है उसके साथ किसानों की जी-तोड़ मेहनत और जिजीविषा दोनों का गहरा संबंध है।
किसानों के जीवन को यहाँ आकर गहराई से देखने का मौका मिला। खून पसीना एक करके धान उगाने वाले किसान की मजबूरी भी साफ दिखाई पड़ी। ’राइस मिल’ पर सरकार का अख्तियार न होना और इसलिए कम दामों में ही किसानों के धान को बेच देने की मजबूरी उनको धान का वाजिब दाम नहीं दिलवा पा रही। आलू की खेती करने वाले किसानों के साथ भी यही समस्या है। सरकारी ठंड़े गोदामों की कमी के कारण किसानों को या तो वाजिब दाम न मिलने तक आलू को सुरक्षित रखने के लिए ठंडे गोदामों के मालिक को भाड़ा देना पड़ता है या फिर कम दामों में इसे बेच देना पड़ता है। मन में अनायास ही यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि कॉमर्स क्षेत्र में शोधकार्य करने वाले विद्यार्थी अगर ऐसे व्यावहारिक समस्याओं के समाधान खोजने के लिए शोधकार्य करते तो शिक्षा पर सरकार द्वारा किया जाने वाला विपुल व्यय सार्थक हो पाता।
प्रकृति की गलियों में घूमते हुए मन मानो कुछ समय के लिए व्यावहारिक समस्याओं के घने जंगल में फँस गया था। आम्रपाली पर्यटन केन्द्र के जलाशय में नौकाविहार मन को फिर से प्रकृति के साये में ले आया, प्लास्टिक के पैडल बोट पर चढ़कर नौकाविहार एक यादागार मंजर बनकर रह गया। आम, नारियल, गुलमोहर के वृक्षों से घिरे जलाशय में नौका विहार करते हुए किनारे बैठे कुछ सफेद पंछियों को देखना एक खूबसूरत अहसास था। जलाशय के किनारे लगे गुलमोहर के पेड़ों पर जब फूल खिले हों तब यही नौकाविहार कितना मनोरम होगा यह महसूस करके मन में गुलमोहर के फूलों से लदे पेड़ और लहलहाते हरे खेत दिखाई देने की ऋतु में यहाँ आने की इच्छा मानो जमकर बैठ गई।
दोपहर को भेल्की नामक गाँव में साल वृक्षों के वन के बीच बसे स्थान भेल्की मचान में जाने की योजना पहले से बनी हुई थी। साल वृक्षों के वन और सोनाझुरी वृक्षों के वन के बीच से पक्की सड़क बल खाती हुई भेल्की मचान की ओर चली गई थी। रास्ते में सदियों पहले भेल्की के जमींदारों द्वारा बनाई गई इमारतों के ध्वंसावशेष भी दिखाई पड़े। वन के बीच जलाशय भी थे। रख-रखाव की कमी, तालाब के अपरिष्कृत जल और उस जल में रखे दो टूटे-फूटे नावों को देखकर मन भेल्की मचान में रम नहीं पाया। थोड़े ही समय में हम बाहर निकलकर साल वृक्ष के वन के बीच से गुजरी पक्की सड़क की निर्जनता को महसूस करके तृप्त होने लगे। भेल्की मचान के पास ही पुराने ईंटों से बना एक लम्बा ढाँचा दिखा। ड्राइवर ने बताया यह कभी जमींदारों का ’वाच टावर’ हुआ करता था। फिर नक्सलों के ज़माने में इसके नीचे सुरंग खोदा गया। उस सुरंग को अब लोहे के गेट से बंद कर दिया गया है।
धानी जमीन के इस सौंदर्य को छोड़कर शहर लौटने का दिन हाजिर था। हम सुबह की सैर पर निकलकर यमुनादिघि के आखिरी छोर तक गए। लोहे के तारों को पार करके हम खेत की ओर आ गए थे। खेत और यमुनादिघि जलाशय के बीच बने टेढ़े-मेढ़े कच्चे रास्ते पर चलते हुए सुबह की हल्की धूप और ताज़ी हवा जैसे जेहन में रिस रही थी। दूर के कुछ खेतों में लोग धान के सूखे पौधों का गट्ठर बाँध कर गाड़ी में रख रहे थे। एक खेत में धान की कटाई के लिए गाड़ी खड़ी दिखाई दी। दूर से एक व्यक्ति बैलगाड़ी लेकर जाता हुआ दिखा। उधर हमारे दाहिने तरफ पानी में बत्तखें तैर रही थीं और सफेद, भूरे रंग के पक्षी अपनी लम्बी गर्दन तानकर जलाशय के किनारे शिकार की टोह में बैठे थे। जलाशय और खेतों के बीच विभाजक रेखा-सी बनकर गुलमोहर के पेड़ कतार में खड़े थे। मन में इस दृश्य की ऐसी तस्वीर खिंची जिसे शब्दों में बयान करना कठिन है। इसी तरह चलते हुए जब घास पर जमें ओस कण पर नजर पड़ी तब कविगुरु रवीन्द्रनाथ की वह पंक्तियाँ अनायास ही याद आई जिनमें यह भाव व्यक्त था कि मैं नदी, पर्वत सागर देखने कितनी दूर-दूर तक गया लेकिन घास पर जमे ओस के एक कण के सौंदर्य को कभी देख ही नहीं पाया।

एक अनोखे सफर की दास्तां / The Story of a Unique Journey

प्रकाश और ऊर्जा की अवधारणाएं मेरी कविताओं की किताब ’सृष्टि चक्र’ के लिखने के बाद से ही मन को जैसे रोज सृष्टि में रमने के लिए खींच कर ले जाती थीं। मेरे आसपास रहने वाले लोग इन अवधारणाओं को जड़ विज्ञान के नजरिए से देखते हैं। प्रकाश के साथ बहकर आने वाली ऊर्जा जीवन और सोच को भी बदल सकती है, इस वैज्ञानिक सत्य की बात कहना तो जैसे कोई पागलपन हो। मन ने लगभग मान लिया था कि इन अवधारणाओं की बात लोगों से करना अपनी ऊर्जा नष्ट करना ही है। जड़ विज्ञान की जड़ें विद्यालय स्तर से विश्वविद्यालय स्तर तक जमकर बैठी हैं। अध्यात्म का रिश्ता भी विज्ञान से कट गया है। पौराणिक कहानियों ने विज्ञान को किस्सागोई में ऐसा लपेट दिया है कि उनके भीतर से झांकता विज्ञान नज़र नहीं आता। हकीकत की इसी तस्वीर से मन में मायूसी के बादल छाए हुए थे। ऐसे में उर्मिला का फोन जैसे बादलों के बीच बिजली की चमक दिखा गया।
उर्मिला इटली के एक विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका है। उससे दोस्ती का जरिया मेरी किताब ’सृष्टि चक्र’ ही है। भारत से दूर इटली में बैठकर ई-मेल पर देवनागरी लिपि में लिखा संदेश देखकर ही उसने जवाबी संदेश भेजा था। खुश रहना और खुशी बिखेरना ही उसके जीवन का महामंत्र है। बंगाल के लोकशिल्प ’पटचित्र’ के लिए प्रेम उसके रोम-रोम में बहता है। इस प्रेम में इतना प्रकाश और इतनी ऊर्जा है कि उसे इटली और भारत की भौगोलिक दूरियां भी भारत आने से नहीं रोक नहीं पाती। पटचित्रकारों के साथ रहना, समय बिताना उनके जीवन को करीब से देखना, उनके कला की धड़कन को महसूस करना उसका जुनून है।
उस रोज उर्मिला ने मानो फोन पर प्रकाश और ऊर्जा की बात खुलकर कहने का फरमान दिया था। इटली के यूलुम विश्वविद्यालय के प्राध्यापक जुसेप्पे करियरी ने उर्मिला से ’कविता में प्रकाश’ विषय पर एक डाक्यूमेंटरी फिल्म के लिए भारत की किसी लेखिका का नाम मांगा था। इस सवाल के जवाब में उर्मिला के ज़ेहन में मेरा नाम आना जैसे मन के किसी बन्द कमरे की खिड़की को प्रकाश से भरने के लिए खोल गया।
जुसेप्पे प्राध्यापक होने के साथ-साथ फिल्म निर्माता भी था। ’डस्ट’ , ’एल्फाबेट्स ऑफ रिवर’ जैसे फिल्मों के निर्माता जुसेप्पे ने भारत के प्रति अपने आकर्षण का भाव व्यक्त करते हुए मुझे यह लिख भेजा था कि ’कविता में प्रकाश’ का विषय उसके लिए बेहद खास और मोहक है। यह कठिन तो जरूर है लेकिन भारत में ही इस विषय पर खास विचार विमर्श हो सकता है।
ये संयोग ही था कि जिस वक्त जुसेप्पे का संदेश मुझे मिला मैं प्रकाश से संबंधित भारतीय मनीषियों के विचारों पर आधारित एक किताब पढ़ रही थी। ऐसे मौके पर यह संदेश आना मानो कुदरत की ही कोई कविता हो। बहुत दूर किसी भूखंड पर होते हुए भी कुदरत की ऊर्जा कहीं हमारे सोच और विचारों को जोड़ रही थी। यह सृष्टि का ही अनोखा खेल था कि मैंने प्रकाश पर अपने विचारों को उसके सवालों के हिसाब से लिखना शुरू कर दिया। और फिर वाट्सऐप पर ही लम्बे सवाल जवाब का सिलसिला शुरू हो गया। फरवरी में कोलकाता आकर इस विषय पर मेरे साक्षात्कार की वीडियो रिकार्डिंग करने की बात पर आकर यह सिलसिला खत्म हुआ। उस रोज प्रकाश और ऊर्जा के मेरे मनपसंद विषय पर बात कर पाने के कारण मन पर खुशी का आलम छाया हुआ था। इस बात को खुल कर न कह पाने की मायूसी मानो गलकर कहीं बह गई थी और मन की गहराइयों में कहीं छिपा श्वेत धवल हिमालय का शिखर मानो मानस पटल पर उभरकर सूरज की रोशनी के स्पर्श से सुनहरी छटा बिखेरने के लिए तैयार बैठा था।
जुसेप्पे के इटली से भारत पहुँचने का पल हाज़िर था। उसके साथ उसकी छात्रा नोएमी भी आ रही थी। ’कविता में प्रकाश’ फिल्म विद्यार्थियों की परियोजना का अंग थी। नोएमी की भारत में यह पहली यात्रा थी। जुसेप्पे के बरसों पुराने दोस्त तपन के घर रुकने की योजना थी। दीपांकर का नाम भी बरसों पुराने दोस्तों की सूची में शामिल था। एफ.टी.आई. पूने से जुड़ा फिल्म निर्माता दीपांकर कोलकाता के इस सफर में जुसेप्पे और नोएमी का साथी था। रूपकला अकादमी से जुड़े तपन और दीपांकर अपने काम के सिलसिले में अन्य देशों की यात्रा कर चुके थे। जुसेप्पे और नोएमी से मिलने पहले दिन तपन के घर पहुंचते ही मैंने इन्हीं यात्राओं की बातों का कारवां पाया।
पहले दिन ही शाम के चार बजे हमें साक्षात्कार की शूटिंग के लिए निकलना था। मेरी एक आदत की बात मैं पहले ही दीपांकर और जुसेप्पे को बता चुकी थी। यह आदत कैमरा से दूर भागने की आदत है। प्रकाश में न आने की आदत है। यहाँ तक कि पारिवारिक तस्वीरों में भी इसी आदत की वजह से मेरा मानोनिशान कम ही मिलता है। इस आदत की जड़ में मेरी यह सोच है कि सिर्फ प्रकृति की तस्वीर ही एक साथ बहुत कुछ कह सकती है। लोगों की तस्वीरें तो दिखावे का साधन बनती है या फिर नास्टाल्जिक होने का कारण। तस्वीर खिचवाने के लिए खड़े होने में एक कृत्रिमता है। इस कृत्रिमता से दूर भागने की मेरी पुरानी आदत थी। आत्मा का प्रकाश असली प्रकाश है जो शरीर से फूटता है। कृत्रिम प्रकाश से कैमरे के सहारे तस्वीर खिचवाने की प्रक्रिया में आत्मा के प्रकाश पर दिखावेपन का अंधेरा हावी हो जाता है। कैमरे से दूर भागने की मेरी कोशिश दरअसल इस अंधेरे से दूर भागने की कोशिश ही थी। साक्षात्कार को कैमरे में कैद करने के प्रति मैंने अपनी उदासीनता पहले ही जुसेप्पे से व्यक्त की थी। लेकिन भारतीय संस्कृति और काव्य में प्रकाश के स्वरूप को इटली वासियों के सामने लाने की धुन उस पर सवार थी। उसके कार्य के प्रति श्रद्धाभाव, भारतीय संस्कृति में व्यक्त प्रकाश के प्रति नजरिये को विश्व के सामने लाने के जुनून और मेरे काव्य में प्रकाश की स्थिति को समझने और समझाने की जिद के सामने मुझे हार मानना ही पड़ा।
दो कैमरे, दो मनोपौड और तस्वीरें खींचने के लिए अन्य छोटे-छोटे सामान लेकर हम शूटिंग के लिए उपयुक्त जगह की तलाश में गाँव के रास्ते की ओर चल पड़े थे। रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय में शोध कर रहे अंकुश के साथ जुसेप्पे, नोएमी और मैं गाड़ी में थे। और दीपांकर आगे बाइक से रास्ता दिखाता हुआ चल रहा था। पक्के सड़क पर गाड़ी रोककर हम खेत की मेड़ों से होते हुए दूर हरे खेतों की ओर बढ़ रहे थे। तालाब में गले तक डूबकर खड़ी गायें, गाँव के कच्चे मकान, मिट्टी के कच्चे रास्ते, घरों के आसपास घूमते मुर्गियों और बकरियों को पार कर हम ऐसी जगह पर पहुँचे जहाँ से दूर तक हरियाली ही हरियाली फैली दिखती है। जुसेप्पे, दीपांकर और नोएमी की आँखें इस साक्षात्कार के लिए एक ऐसा ही जमीन का टुकड़ा खोज रही थीं जहाँ से दूर तक हरियाली ही हरियाली दिखाई दे। गाँव के लोग हमें एकटक देख रहे थे। अब मेरे सामने साक्षात्कार का वह पल हाजिर था। पहली बार, मैंने महसूस किया कि कृत्रिम और प्राकृतिक वातावरण में क्या अंतर होता है? कक्षा में बोलने और निर्जीव कैमरे के सामने बोलने में कितना भावात्मक अन्तर है। मेरे विचार निश्चित रूप से साहित्य के शिक्षक के विचारों की तरह ही तत्वपरक थे। जुसेप्पे ने इनमें अहसासों का रंग भरने की अपील की। क्योंकि इस साक्षात्कार को देखने वाले दिल से सुनने वाले लोग हैं। इसलिए बातों में कशिश होना जरूरी है। इस अपील के साथ ही मानो मेरी दुनिया इधर की उधर हो गई। अहसासों को पकड़ने की बात सुनकर होठों पर मानों ताला लग गया। जुसेप्पे लगातार अपनी बात कहने की कोशिश करता रहा लेकिन मेरे होश किसी दूसरी दुनिया का सफर तय कर रहे थे। मन हरियाली में डूबना चाहता था, डूबते सूरज को एकटक देखना चाहता था। लेकिन साक्षात्कार के प्रश्नों से मन को फुरसत ही नहीं मिल पा रही थी। इसी उधेड़बुन में सूरज डूबता गया। यह फाइनल शूटिंग नहीं बल्कि ट्रायल था। जुसेप्पे जानता था कि अगली कोशिश ही मुकम्मल कोशिश होगी । यह पहली कोशिश कार्य की प्रकृति का अंदाजा लगाने के लिए थी। यह बात सुनकर मन को कुछ राहत मिली। जुसेप्पे मन की गहराइयों में डूबकर अहसासों के मोती खोजने की राहें बताने में जुट गया।
जुसेप्पे का मानना था कि हर कवि का काव्य मानों जमीन का एक ऐसा टुकड़ा है जहाँ नदी, पहाड़, झरना कुछ भी हो सकता है जो कवि को लिखने की प्रेरणा देता है। उसने मुझसे मेरी कविता का ’लैंडस्केप’ क्या है? यह सवाल पूछा। मेरी कविता की दुनिया अमूर्त भावों की दुनिया थी। यहाँ प्रकाश आत्मा और ज्ञान स्वरूप था। इस सवाल का कोई जवाब मेरे पास नहीं था। लेकिन जुसेप्पे को कवि के भावों को दर्शकों के सामने मूर्त रूप में दिखना था। इसके लिए जरूरी था कि मेरे विचार और भावों से चित्र उभरकर सामने आए। लेकिन अमूर्त दुनिया में भला चित्र मैं कैसे खोजती? जुसेप्पे लगातार बोलता रहा कि चित्र तो जरूर है अपने भीतर खोजो तो जरूर मिलेगा। वह लगातार अपने भीतर उस चित्र को खोजने की अपील करता रहा।
अंधेरा होने को था। साक्षात्कार के इस अनुभव से मन पर संदेह के बादल छाए हुए थे। तय हुआ दीपांकर के घर पहुँचकर अगले छह दिनों की योजना तय होगी। और वहीं जुसेप्पे मेरी सोच को शूटिंग की जरूरतों के अनुरूप ढालने के लिए सुझाव में देगा। लेकिन एक बात हम दोनों के बीच स्पष्ट थी कि ऐसा कुछ मुझे नहीं कहना पड़ेगा जो मेरे अनुभव का अंग नहीं है। निर्देशक के रूप में जुसेप्पे की काबिलियत का अहसास मुझे तब हुआ जब मेरे मन में एकाएक मेरी कविता का लैंडस्केप उभरकर सामने आया। बर्फ से ढ़के पर्वत का सफेद शिखर जिसे सूरज की किरणों ने सुनहरे रंग में डुबो दिया है। मैंने महसूस किया कि जुसेप्पे के शब्दों ने ही तराश कर अमूर्त की भीड़ में दबे इस चित्र को उभारा है। फिर मुझे सृष्टि चक्र की हर कविता में इस चित्र का प्रतिफलन दिखने लगा। जुसेप्पे को शब्दों को पकड़कर उनसे चित्र खींचने की आदत है। इसलिए चित्रात्मक शब्दों को वह तुरंत पकड़ता है। और मेरी आँखें दृश्य जगत में दाखिल होकर अमूर्त की गलियों से होते हुए शब्द पकड़ने के लिए दौड़ती हैं। दोनों के सोच की इस विरोधी गति के चलते जो तनाव पैदा हुआ था वह मानस पटल पर श्वेत धवल पर्वत के चित्र के उभर कर सामने आते ही दूर हो गया।
दीपांकर का घर मानो अपनेपन में डूबा एक साम्राज्य था। जुसेप्पे और दीपांकर की दस साल पुरानी दोस्ती में भी इसी अपनेपन की झलक थी। दस साल पहले रूपकला अकादमी में इनकी दोस्ती का बीज पड़ा था। फिर दीपांकर इटली के नापोली में जुसेप्पे के घर रहकर आया था। उसी ने बताया कि जुसेप्पे के बरामदे से विसुवियस पहाड़ दिखता है। आधुनिकता के कृत्रिम छाप से दूर सीधा साधारण-सा दीपांकर का घर सरलता के साथ रमने का न्यौता देता है। चारपाई पर वृद्ध दादी हमारे पहुँचने के साथ ही तकिये से सर उठाकर दरवाजे की ओर देखने लगी। माँ ने रसोई से निकलकर अपनेपन के साथ घर में बैठाया। पिताजी और माँ दोनों ही हमारी जरूरत के हिसाब से सामान जुटाने में लग गए। भारतीय संस्कृति के अपनेपन के भाव की छाप पूरे परिवार में स्पष्ट थी।
जुसेप्पे बंगाल में कुम्हारों के इलाके कुमारटुली में मूर्तियों से भरा स्टूडियो देखना चाहता था। लेकिन उसे मालूम था फरवरी के बाद ऐसा नजारा देख पाना मुश्किल है। इस बात को तो उसने मान लिया था लेकिन किसी एक मूर्ति के बनने से लेकर पंडाल में आने, पूजा करके विसर्जित होने तक वह शूटिंग करने की हसरत को पूरा करने की बात पर अड़ा हुआ था। ऐसे में दीपांकर के घर के लोगों ने प्रेम, अपनेपन और सहयोग का एक नया दृष्टांत सामने रखा। एक कुम्हार से बातचीत करके मूर्ति बनाने का ऑर्डर दिया गया। पंडाल सजाने, पूजा करवाने की तैयारियों में दीपांकर का घर क्या मुहल्ला ही जुट गया। दीपांकर जुसेप्पे की चाहतों को समझकर उसे पूरा करने की कोशिश में लगातार जुटा हुआ था।वह इस कार्य में आनंद महसूस कर रहा था। और जुसेप्पे का सृजनात्मक मन कब किस चीज की मांग करे इसका पता तो स्वयं उसे भी नहीं था लेकिन दीपांकर की निगाहें उसमें एक निर्माता की तड़प को अच्छी तरह महसूस कर पा रही थीं। स्वयं भी फिल्म निर्माता होने के कारण जुसेप्पे की चाहत कहीं न कहीं उसकी भी चाहत का अंग बन जा रही थी। और वह हर हाल में उस चाहत को पूरा करने में रमता जा रहा था। सिर्फ चाहत ही नहीं उसके कई सवालों के जवाब भी वह इस तरह दे रहा था कि जुसेप्पे भारतीय संस्कृति की नब्ज़ को पकड़ सके। जैसे, ये कलाकार इतनी खूबसूरत मूर्तियाँ बनाते हैं लेकिन इसे पानी में क्यों फेंक दिया जाता है? अगर इन्हें नष्ट ही करना है तो बनवाते क्यों हैं? विसर्जन क्यों किया जाता है? तमाम सवाल। ऐसे सवाल और अन्य कई सवालों के जवाब को दिल से महसूस करवाने के लिए जुसेप्पे और नोएमी के साथ दीपांकर और अंकुश दो दिनों तक सुबह से शाम तक कुमारटूली में घूमते रहे। कलाकारों की जिंदगी को वे करीब से देखना और समझना चाहते थे। उनकी यह कोशिश उन्हें महिला कलाकार चाएना पाल के दरवाजे तक ले गई। पिता की मौत के बाद अपनी ही चेष्टाओं से मूर्तियाँ बनाना सीखने वाली इस स्त्री की कहानी संघर्ष की जीती जागती कहानी है। नपुंसकों के लिए अर्धनारीश्वर की दुर्गा मूर्ति बनाने के लिए कठिन संघर्ष करके आज वह कुमारटूली में बेहद चर्चित हैं । चाएना पाल की कहानी में स्त्री संघर्ष की बात ने जुसेप्पे को खास तौर पर आकर्षित किया था।
भारत आने से पहले ही जुसेप्पे ने यहाँ के मंदिर के शांत वातावरण को महसूस करने के प्रति अपनी इच्छा जाहिर की थी। दक्षिणेश्वर और बेलूरमठ में मंदिरों में होने वाली भीड़ और वहाँ कैमरा लेकर जाने की पाबंदी के चलते ये मंदिर सूची से बाहर निकल गए थे। अचानक मन में पुरानी कुछ यादें ताजा हो उठी। बरसों पहले मन उदास होने पर मैं गंगा के किनारे बसे एक शांत मंदिर, जहाँ लोगों का अक्सर आना जाना नहीं होता, जाया करती थी। मन में यह बात आते ही अंकुश के साथ उस मंदिर की ओर निकल पड़ी। मंदिर का वातावरण आज भी उतना ही शांत था। मंदिर में प्रवेश करने से पहले मिट्टी का विशाल प्रांगण, प्रांगण में लगे घने वृक्ष और उसके किनारे गंगा नदी का बहना, कोयल की आवाज सुनते हुए मंदिर के शांत परिसर में दाखिल होना एक सुंदर अनुभव था। फिर हमने गंगा के किनारे बसे कई मंदिरों में से तीन शान्त प्राचीन मंदिरों को चुनकर उनकी तस्वीरें जुसेप्पे को भेजी। ये मंदिर उसे बेहद पसंद आए थे। दीपांकर, नोएमी, जुसेप्पे और अंकुश के साथ गंगा के किनारे बसे इन मंदिरों की सैर करते हुए मानो भारतीय संस्कृति की खुशबू, प्राचीनता की गंध, गंगा नदी की शीतलता और प्रकृति का सौंदर्य मन की गहराइयों में रिस रहा था। मंदिर की पूजा, आरती सब कुछ जुसेप्पे और नोएमी कैमरा में भरकर इटली ले जाना चाहते थे। क्योंकि उनका सोचना था कि इन अनुष्ठानों में भारतीय संस्कृति का प्रकाश बसता है।
मंदिरों के बाद अब कलाकार के कार्यशाला में जाने की बारी थी। वह कलाकार जो उस खास मूर्ति को गढ़ रहा था जिसकी पूजा से लेकर विसर्जन तक के कार्यक्रम को जुसेप्पे कैमरा में कैद करना चाहता था। कलाकार श्यामल की कार्यशाला मूर्तियों के ढांचों से भरी थी। बाँस, लकड़ी, पुआल से बने मूर्तियों के ढांचे, कच्चा मकान और मिट्टी की फर्श में एक अजीब-सी गँवई गंध थी। भरे पूरे शहर में यह कार्यशाला मुझे गाँव के एक टुकड़े-सा दिख रहा था। बांस के ढांचे से लेकर पुआल पर मिट्टी चढ़ाने और मूर्ति को रंगने से लेकर पंडाल तक ले जाने का एक भी पल जुसेप्पे छोड़ना नहीं चाहता था। क्योंकि उसके लिए इन्हीं चित्रों में भारतीय संस्कृति की वह गंध थी जिसे इटली तक ले जाना जरूरी था । जुसेप्पे बांस पर कील ठोकते कलाकार के हाथ, पुआल पर मिट्टी लीपते हाथ, तन के ढांचे पर सिर बैठाते हाथ की तस्वीरें लेने में लगा था। उन हाथों की तस्वीरें जो तिल तिल कर उस देवी को रच रहे थे, जो पूजा स्थल में विराजेगी और भक्तों की आस्था का आधार बनेगी। सिर्फ कलाकार के हाथ ही नहीं मूर्ति गढ़ते हुए उसके अनुभव को भी जुसेप्पे कैमरे में कैद करना चाहता था। कलाकार से सवालों का जवाब पाकर वह संतुष्ट हुआ। फिर कलाकार के साथ मिलकर मूर्ति को रंगने का अनुभव, काम के बहाने लोगों से घुलने मिलने का अनुभव जुसेप्पे और नोएमी को भारतीय संस्कृति में मानों डुबो-सा रहा था।
देखते ही देखते जुसेप्पे और नोएमी के इटली वापस लौटने का दिन आ गया। सुबह फिर मेरे साक्षात्कार को कैमरे में बंद करने का पल हाजिर था। हम फिर किसी खूबसूरत प्राकृतिक छटा बिखेरते स्थल की खोज में गाँव की ओर निकल पड़े थे। इन छह दिनों में दीपांकर, जुसेप्पे, नोएमी हर रोज रात को सिर्फ तीन या चार घंटे ही सो पाए थे। खाने-पीने के समय का भी व्यस्तता के बीच ध्यान रखना मुश्किल था। शूटिंग के तनाव को मेरे मन ने उस दिन नोएमी को देखकर पहली बार महसूस किया जब साक्षात्कार के लिए जगह खोजते हुए वह तनाव और थकान से रो पड़ी थी। साक्षात्कार के बाद विसर्जन और फिर तपन के घर जाकर हवाई अड्डे के लिए निकलने की तैयारी सिर पर सवार थी। नोएमी ने अपने आप को समेटा और साक्षात्कार में भारतीय संस्कृति में प्रकाश का महत्व, मेरी कविता की भाव भूमि, उसमें प्रकाश की स्थिति, प्रकाश और अंधेरे के बीच का रिश्ता और कविता लिखने की प्रेरणा से संबंधित तमाम सवालों के मेरे द्वारा दिये गए जवाबों को कैमरे में कैद किया। उस रोज पहली बार मैंने फिल्म बनाने वालों के तनाव को करीब से देखा था। नोएमी के आंसू जैसे मन में भीतर तक उतर गए थे। लिखने के लिए वक्त की नब्ज को पकड़कर महसूस करते हुए चलने की जरूरत पड़ती है। प्रकृति के साये में कभी घंटों बीत जाते हैं। उन पलों में प्राकृतिक ऊर्जा कब चुपके से मन में रिसकर मुझे तरोताजा कर जाती है पता ही नहीं चलता। आज मैंने जब नोएमी दीपांकर, जुसेप्पे की तेज रफ्तार से चलती जिंदगी को देखा तब महसूस किया कि प्रकृति के साये में चुपचाप बैठकर समय बिता पाना मानो सृष्टि की नेमत पाने के बराबर है।
साक्षात्कार के बाद हम दीपांकर के घर लक्ष्मी देवी के विसर्जन पर्व के लिए चल पड़े थे। पिछले दिन रात को धूमधाम से पूजा सम्पन्न हुई थी। पूजा की जीवंत तस्वीरों को कैमरे में कैद कर ले जाने की जुसेप्पे की हसरत पूरी हुई थी। सिंदूर का खेल, ढाक की आवाज के साथ लक्ष्मी की प्रतिमा को तालाब के किनारे ले जाया गया। देवी की मूर्ति के आखिरी फूल के पानी में डूबने तक दीपांकर ने पानी पर ही कैमरे को टिकाकर रखा। उस दिन मैंने महसूस किया कि जहाँ मेरा मन हर पल की तस्वीर मन में ही आंक रहा था, वहीं जुसेप्पे, दीपांकर और नोएमी हर क्षण के चित्र को कैमरे में कैद कर रहे थे। फर्क सिर्फ इतना था कि मेरी तस्वीरें आँखेँ बंद करके सिर्फ मैं ही देख सकती थी और उनकी तस्वीरें लोग आँखें खोलकर किसी भी वक्त देख सकते थे। वक्त कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। जुसेप्पे और नोएमी के लौटने का वक्त करीब आ गया था। मैं मन ही मन इन खूबसूरत पलों का साक्षी बनाने के लिए सृष्टि की अदृश्य ऊर्जा का शुक्रिया अदा कर रही थी।

दो ऐतिहासिक शहरों की कथा / The Story of Two Historical Cities

ऐतिहासिक शहर दिल्ली और आगरा देखने का सौभाग्य पच्चीस साल पहले हुआ था। आज फिर किसी काम से जब दिल्ली जाने की जरूरत पड़ी तो इन दोनों शहरों को फिर से देखकर पुरानी यादें ताजा करने का ख्याल दिल में आया। सुबह साढ़े छह बजे हवाई जहाज से हम दिल्ली के लिए रवाना हुए। यह मेरे जीवन की पहली हवाई यात्रा थी। उड़ान भरते ही धीरे-धीरे जमीन की रेखाएँ धूमिल होने लगीं और बादलों को चीरते हुए हम उनसे ऊपर पहुँच गए। यहाँ से सब कुछ ऐसा दिख रहा था मानो ख्वाबों की दुनिया हो। लगभग डेढ़ घंटे में हम दिल्ली पहुँच गए।
दिल्ली शहर के कुतुब मिनार से इस शहर के पर्यटन स्थलों को देखने का सिलसिला शुरू हुआ। सन् 1193 में दिल्ली सल्तनत के संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक के द्वारा कुतुबमीनार का निर्माण कार्य शुरू हुआ था। फिर इल्ततमिश, अलाउद्दीन खिलजी ने इसके निर्माण को आगे बढ़ाया। सन् 1369 में बिजली गिरने की वजह से इसका ऊपरी हिस्सा नष्ट हो गया था जिसका फिरोज़ शाह तुगलक ने पुनर्निर्माण करवाया। भीषण भूकम्प के झटकों से जब सन् 1505 में यह मिनार फिर से क्षतिग्रस्त हुआ तब सिकन्दर लोदी ने इसे ठीक करवाया। मेजर रोबर्ट स्मिथ ने इसके पाँचवें मंजिल के ऊपर छठी मंजिल बनवाने की कोशिश भी की थी। पास ही खड़े एक पर्यटक अपने साथी को बता रहे थे कि कुतुबमीनार के प्रांगण में बने मस्जिद के पूर्वी दरवाजे के भीतर की ओर फारसी में लिखा है कि इस मस्जिद का निर्माण दिल्ली के सत्ताइस हिन्दू और जैन मन्दिरों को तुड़वाकर किया गया। मंदिरों के स्तंभों को मस्जिद में लगा दिया गया। उन पर की गई खुदाई आज भी बरकरार है। गुप्त साम्राज्य का ज़ंगमुक्त लोहे का स्तंभ भी यहीं लाकर रखा गया है जिस पर ब्राह्मी लिपि की खुदाई बरकरार है। इतिहास के गर्भ से सत्य का मोती खोज लाना तो दुष्कर है पर यह बात सुनकर मन में अनायास ही यह बात जरूर उभर कर आयी कि इन इमारतों और स्तंभों की आत्मा इनकी कलात्मकता में बसी हुई है। तभी हिन्दू मुस्लिम वैमनस्य के चलते भले ही मन्दिरों के पत्थर मस्जिद में लग गए हैं लेकिन आज ये कलाकृति के नमूनों के तौर पर पारसी और ब्राह्मी दोनों लिपियों को संजोए हुए धार्मिक एकता का प्रतीक बनकर हर धर्म के पर्यटकों को अपनी ओर खींच रहे हैं।
शासकों की नगरी और भारत का दिल यह शहर दिल्ली कई शासकों की कला और संस्कृति की छाप लिए हुए है। इस शहर में खड़े लोदी वंश के नामोनिशां से रूबरू होने हम लोदी बाग पहुँचे। इसे पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के बीच सैय्यद तथा लोदी शासकों ने बनवाया था। इसका पुनर्संस्कार स्टेन और गाररेट एक्बो ने सन् 1968 में करवाया। यहाँ मुहम्मद शाह और सिकन्दर लोदी के मकबरे और बड़ा गुम्बद और शीश गुम्बद उस युग की वस्तुकला की गरिमा को पेश करते हैं। आज इस जगह की हरियाली और सुव्यवस्था सुबह की सैर, व्यायाम और योगाभ्यास के लिए लोगों को अपनी ओर खींचती है।
मृत्यु के बाद दफनाने की जगह को शान्तिपूर्ण और भव्य बनाने की रीत के चलते मुस्लिम शासको ने इस शहर को कई खूबसूरत मकबरे भेंट किए। हुमायूँ का मकबरा उनमें से ही एक है। मिरिक मिर्जा घियास के कलात्मक परामर्श से निर्मित यह मकबरा भारतीय उपमहाद्वीप का पहला ऐसा मकबरा है जो बागों से घिरा है। सन् 1993 में यूनेस्को ने इसे अंतर्राष्ट्रीय विरासत का दर्जा दिया है। मुगल सल्तनत के संस्थापक बाबर ने बागे बाबर की अवधारणा सामने रखकर स्वर्गीय बागीचे में खुद को दफनाने का जो सपना देखा था वह हुमायूँ के समय में बरकरार रहा। हुमायूँ के मकबरे के प्रांगण में बने चार बाग फारसी शैली में बने अनोखे बाग हैं। स्वर्गीय बागीचे के बीच बने इस मकबरे में मुगल राज परिवार के अन्य कई सदस्यों को भी दफनाया गया है। एक ब्रिटिश व्यवसायी विलियम फिन्च ने इस मकबरे के अन्दरूनी वैभव, कीमती कालीन और शामियाना, सफेद कपड़े से ढके कुरान और उसके सामने रखी हुमायूँ की तलवार का जिक्र किया है। इस वर्णन के साथ आज के युग की हकीकत को मिलाना असंभव है। इससे समय या काल की शक्ति का ही प्रमाण मिलता है। सपनों का बाग आज भले ही सरकार की कोशिशों से हरा भरा और सुरक्षित हो लेकिन कब्र के आसपास की जगह का वैभव कीमती आसबाबों के अभाव में फीका पड़ा हुआ है। शेरशाह सूरी के अमीर खान का मकबरा भी हुमायूँ के मकबरे तक पहुँचने की राह में ही खड़ा मिलेगा। जो दरअसल उस प्रांगण का सबसे पुराना मकबरा है। खान ने मुगलों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी लेकिन मृत्यु के बाद मुगल शासक हुमायूँ के मकबरे के पास ही उनका भी मकबरा खड़ा है। वैमनस्य का कहीं भी नामोंनिशां नहीं है। मानो मृत्यु के आहोश में दोनों का शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व है।
इस सफर में मेरी पच्चीस साल पुरानी यादें जहाँ ताजा हो रही थीं वहीं इतिहास की गलियों में घूमकर इस देश के शासकों की पुरानी निशानियों को एक बार फिर से नए सिरे से देखने का मौका मिल रहा था। पुरानी यादों को जिंदा करने के इस सफर में मेरा अपने कॉलेज के दिनों की सहेली मौमिता से मिलना कॉलेज एवं विश्वविद्यालय के दिनों की यादों को ताजा कर गया। इस पूरे सफर में एक ओर मेरे पुराने दिनों की यादें ताजा हो रही थीं, वहीं दूसरी ओर समय के सशक्त प्रभाव का अहसास भी हो रहा था। अगले दिन सुबह हमें अत्यंत कम समय में दिल्ली से आगरा जाने वाली विलास प्रधान रेलगाड़ी गतिमान एक्सप्रेस से आगरा के लिए रवाना होना था। यह गाड़ी निजामुद्दीन स्टेशन से छूटती है। इसलिए हमने रात को निजामुद्दीन स्टेशन के रिटायरिंग रूम में रहने का निर्णय लिया था।
अगले दिन के सफर में गतिमान एक्सप्रेस के रेलकर्मियों की मेज़बानी ने राजशाही रंग भर दिया। इनकी मेज़बानी का लहज़ा और मेज़बानों की वेशभूषा आगरा पहुँचने से पहले ही मानो राजाओं की नगरी में प्रवेश करने की सूचना दे रही थी। आगरा का रेलवे रिटायरिंग रूम भी राजशाही लहज़े का ही था। सुबह तकरीबन साढ़े दस बजे हम अकबर के ख्वाबों का किला फतेहपुर सीकरी देखने निकल पड़े थे। कहा जाता है कि यहाँ सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से अकबर को जोधाबाई से पुत्र संतान की प्राप्ति हुई थी। शेख सलीम चिश्ती का बसेरा सीकरी में पहाड़ी पर था। पुत्र पाने की खुशी में अकबर ने यह किला बनाया जिसका नाम दिया फतेहपुर। पुत्र संतान की प्राप्ति मानो अकबर के जीवन पर फतेह की सूचक हो। पहाड़ी पर स्थित इस महल तक ले जाने के लिए नीचे बसें खड़ी रहती हैं। पहाड़ी पर पहुँचकर हम फतेहपुर के दिवाने आम से इस किले में दाखिल हुए। बीच में बागीचा और उसके तीनों तरफ आम जनता के बैठने के लिए जगह थी। और महल की तरफ ऊँची जगह पर सम्राट के बैठने की जगह थी। मंत्री सम्राट के आसन के ठीक नीचे खड़े होते थे। और विचार के लिए रखे जाने वाले मुद्दों की घोषणा करते थे। दीवाने आम से होकर महल के भीतरी हिस्से में जाने का रास्ता था।
दीवाने खास जहाँ बैठकर अकबर ने अपने दरबार के नवरत्नों के साथ दीन ए इलाही धर्म की बात को साझा किया था, एक अद्भुत जगह है। दीवाने खास के बीचोबीच एक मोटा खंबा जिसमें उनके तीनों धर्म की रानियों के सम्मान में इसाई, मुस्लिम और हिंदू धर्म के प्रतीक चिह्न बने हैं। इस खंबे के ऊपरी हिस्से में अकबर के बैठने की जगह थी। और उन्हें घेर कर उनके नौ मंत्रियों के बैठने की जगह।
एक तरफ गंभीर विषयों की चर्चा के लिए दीवाने खास था तो ठीक उसके पीछे रानियों की लुका-छिपी का खेल खेलने के लिए खास ढंग से बने कमरे थे। और उसके बाहर अकबर के चौसर का खेल खेलने के लिए विशेष प्रबंध था, जहाँ दासियाँ अलग-अलग वस्त्र पहनकर एक एक चौकोर में खड़े होकर गोटियों की भूमिका अदा करती थीं। और सम्राट के इशारे पर एक चौकोर से दूसरे चौकोर में जाती थीं।
पंचमहल का अकबर के ख्वाबगाह अर्थात रहने की विलासिता पूर्ण जगह से जुड़ा होना, ख्वाबगाह के भीतर गुलाब जल और चंदन की लकड़ियों से बनी सीढ़ियों के होने की बात सुनकर सम्राट के विलासितापूर्ण जीवन की कल्पना आसानी से की जा सकती है। तीनों रानियों के लिए उनके धार्मिक विश्वास का सम्मान करते हुए बनवाए गए महलों में अकबर के धार्मिक सहिष्णुता की छवि स्पष्ट उभरकर सामने आती है। शाकाहारी होने के कारण जोधाबाई की अलग रसोई थी। और मायके से दासियाँ मिलने के कारण जोधाबाई के महल में उनके भी रहने का प्रबंध था। जोधाबाई के महल के बीचोबीच तुलसी का पौधा एक ऊँची जगह पर लगा था। आज वहाँ एक अन्य पौधा लगा है। सोना चांदी और मणियों से कभी थे महल अलग शोभा बिखेरते थे। लेकिन ब्रिटिश राज में इन मणियों को उखाड़कर एवं सोने को गलाकर निकाल लिया गया। सुनहरी और रंगीन चित्रकारी भी वक्त के साथ आज फीकी हो गई है। इसलिए उस युग के ऐश्वर्य को महसूस करने के लिए कल्पना की ऊँची उड़ान भरनी पड़ रही थी। ऐश्वर्य भले ही लुट गया हो लेकिन जलाशय के बीचोबीच बना, वह चबूतरा जहाँ तानसेन और बैजू बावरा के बीच संगीत की ऐतिहासिक प्रतियोगिता हुई थी और जो तानसेन की कला साधना की भी प्रतीक है, उस युग की कलात्मक रुचि का अहसास आज भी दिलाती है।
फतेहपुर में प्रवेश करते ही अकबर और बीरबल के बचपन से पढ़े किस्से याद आने लगे थे। पढ़ी हुई इन कहानियों के किरदारों को इस किले ने जैसे सजीव हो उठने के लिए एक वातावरण दे दिया था। मनोरंजन, संगीत, साधना, धार्मिक सहिष्णुता और सौंदर्यमय वातावरण ने अकबर के शासन के उस काल की एक मनमोहक छवि मन में खींच दी थी। हकीकत का सबसे बड़ा हमला मैंने तब महसूस किया जब यह जाना कि इस नगरी को बनाने में तो पंद्रह साल लगे लेकिन अकबर वहाँ अधिक समय तक नहीं रह पाए, क्योंकि उस जगह पानी की कमी थी। पानी रखने के लिए बना एक गोलाकार बड़ा टैंक, जो आज टूट चुका है, उस पर भी नज़र पड़ी। इस लिहाज से देखें तो यहाँ प्रकृति के सामने राजशाही हारी हुई सी दिखाई देती है।
सीकरी में शेख सलीम चिश्ती का दरगाह फतेहपुर के राज किले के पास ही है। इस दरगाह के दीवारों की नक्काशी देखने लायक है। इस दरगाह में लोग दूर-दूर से चादर चढ़ाने आते हैं। दरगाह आंगन के एक तरफ है और आंगन के तीनों ओर बने कमरों और बरामदे में कभी आइने अकबरी के लेखक अबुल फज़ल बच्चों को तालीम दिया करते थे। दरगाह में आए दर्शनार्थी आज यहाँ घड़ी भर बैठकर शीतल हवा के झोंकों को महसूस करते हैं। दरगाह के ठीक सामने 180 फीट ऊँचा बुलंद दरवाजा मौजूद है। मस्जिद के बनने के पाँच साल बाद और अकबर के गुजरात अभियान की सफलता के प्रतीक रूप में यह दरवाजा बनाया गया। दरवाजे पर मरियम के पुत्र ईसा का यह कथन खुदा हुआ है कि यह दुनिया एक पुल है इसके ऊपर से गुजरो लेकिन यहाँ घर मत बनाओ। प्रार्थना में समय गुजारो क्योंकि बाकी जो कुछ है वह अनदेखा और अनजाना है। आज भी लोग यहाँ शेख सलीम चिश्ती के दरगाह में प्रार्थना में समय गुजारते हैं।
शेख सलीम चिश्ती की दरगाह के पीछे ही कुछ सीढियाँ नीचे की ओर चली गई हैं। गाइड ने बताया कि यहीं अनारकली को जिन्दा चुनवाने का हुक्म हुआ था। इंसान के कई रूप होते हैं। इस हकीकत की पुष्टि इस बात से हो जाती है कि दीन-ए-इलाही की उदारता से भरी घोषणा और अनारकली को जिन्दा चुनवाने का हुक्म दोनों एक ही सम्राट की कोशिशें थीं। अकबर को लाल पत्थर पसंद थे और जहांगीर को सफेद। अपने जीवन में शेख सलीम चिश्ती की खास जगह महसूस करते हुए जहांगीर ने अपने पिता द्वारा लाल पत्थर से बनवाए इस संत के दरगाह को सफेद पत्थर से बनवाया। दरगाह के निर्माण में अपनी पसंद का आरोपण करके मानो जहांगीर ने सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की थी।
फतेहपुर सीकरी के बाद हमारा अगला मुकाम था सिकंदरा। सिकंदरा में अकबर का मकबरा है। इसे बनवाने का कार्य अकबर ने आरंभ किया था लेकिन इसे उसके पुत्र जहांगीर ने पूरा किया। जहाँगीर इस कार्य की देख-रेख के लिए शीश महल में ठहरा करते थे। अकबर के मकबरे में दाखिल होने से पहले सलामी दरवाजे से गुजर कर दाखिल होना पड़ता है। इस दरवाजे की ऊँचाई इतनी कम है कि सिर अपने आप झुक जाता है। गाईड ने बताया कि दर्शनार्थी सिर झुकाकर दाखिल हो। इसलिए इस दरवाजे का निर्माण इस तरह किया गया। श्रद्धा से सिर के झुकने और मजबूरी में सिर के झुकने के बीच भावनात्मक अंतर यहाँ उपेक्षित है। सलामी दरवाजे के बाद शाही दरवाजे पर तीनों धर्मों की रानियों के सम्मान में तीनों धर्म के प्रतीक स्वरूप चिह्न खुदे हुए हैं। शाही दरवाजे पर कभी ऐश्वर्यमय स्वागत की व्यवस्था हुआ करती थी। इस दरवाजे से भीतर प्रवेश करते ही विशाल बागीचे पर नजर पड़ी जहाँ बहुत सारे हिरन चौकड़ी भरते हुए नज़र आए। बीच में मकबरा और चारों तरफ एक ही जैसे बाग और चारों दिशाओं में चार एक से दरवाजे इस मकबरे की खासियत है।
पूर्णिमा की चांदनी रात में ताजमहल के सौंदर्य का वर्णन कई बार सुना था। वह भी एक पूर्णिमा की ही रात थी, जब हम ताजमहल के बहुत करीबी होटल ताज प्लाजा में ठहरे थे। हमारे कमरे की खिड़की से ताजमहल दिखाई दे रहा था। और छत से ताजमहल तक जाने का आलोक सज्जित रास्ता। हमने अगले दिन सुबह ताजमहल देखने का निश्चय किया था। अगले दिन सुबह होते ही हम ताजमहल देखने के लिए निकल पड़े। सफेद संगमरमर से बना ताजमहल जिसने कई कवियों को कविता लिखने के लिए प्रेरित किया, हम उसके सामने खड़े थे। प्रेम की यादगार माना जाने वाला यह स्मारक जो विश्व के सात आश्चर्यों में से एक है उसकी खूबसूरती का बयान करना मुश्किल है। बचपन में सुना था कि शाहजहाँ ने ताजमहल बनाने वाले कारीगरों को कार्य समाप्त होने के बाद तोहफा देने के बजाय उनके हाथ काट दिए थे। यहाँ आकर पता चला कि उनके हाथ नहीं काटे गए बल्कि कारीगरों के साथ शाहजहां ने समझौता कर लिया था कि वे ऐसी ईमारत और न बनाए। उन्हीं कारीगरों के वंशज आज भी संगमरमर पर नक्काशी का काम करते हैं। इतिहास से जुड़ी इन बातों में कितना सत्य है और कितनी कल्पना इसका पता लगाना बेहद कठिन है। एक साहित्यकार तो बस जनता की चित्तवृत्ति का ही बयान कर सकता है। एक ओर सफेद संगमरमर का ख्वाबगाह ताजमहल और दूसरी ओर ताजमहल को देखने आए अतिथियों के सत्कार के लिए नौबत खाना, नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद और पीछे बहती यमुना नदी आध्यात्मिकता, प्राकृतिक सौंदर्य और कलात्मकता का अभिनव संगम पेश करती है।
ताजमहल के ठीक पीछे यमुना नदी दूसरी ओर महताब बाग है। कहा जाता है कि शाहजहां ने वहां काले पत्थर से एक और ताजमहल बनाने की परिकल्पना की थी। लेकिन कार्य शुरू करते ही औरंगजेब ने उन्हें बंदी बना लिया। उनकी चाहत थी कि काले ताजमहल में उन्हें दफनाया जाए। शाही खजाने की हालत देखते हुए और अन्य कई कारणों के चलते औरंगजेब ने अपने पिता को बंदी बनाकर आगरा के किले में रखा। महताब बाग के बागीचों की परिकल्पना भी ताजमहल के लहजे में ही की गई है। यहाँ से यमुना के उस पार का ताजमहल और भी खूबसूरत दिखता है।
हमारा अगला मुकाम था इतमद्उद्दौला का मकबरा। जहांगीर की बेगम नूरजहाँ के पिता मिर्जागियास बेग के इस मकबरे को ’बेबी ताज’ के नाम से भी जाना जाता है। वाकई संगमरमर पर की गई इस मकबरे की नक्काशी को देखकर ऐसा लगता है कि यह ताजमहल का प्रथम संस्करण है। मकबरे के पीछे बहती यमुना नदी को बेबी ताज के पिछले हिस्से में बने बरामदे पर बैठकर देखना एक अनोखा अनुभव था।
आगरा के लाल किले को दीवारों से घिरा शहर कहा जा सकता है। पानीपत के युद्ध में इब्राहिम लोदी को हराने में आगरा की भौगोलिक स्थिति का एक बहुत बड़ा योगदान रहा है। अकबर ने अपने साम्राज्य को सशक्त बनाने के लिए बाबर के समय के बाद से उपेक्षित आगरा के किले का पुनर्निर्माण आरंभ किया। फिर जहांगीर, शाहजहां ने इस किले में कई जगहों पर लाल पत्थर की जगह सफेद संगमरमर का प्रयोग करके इमारतें बनवाई। इसी किले में औरंगजेब ने शाहजहाँ को मुसम्मन बुर्ज में कैद करके रखा था। यह कैद दरअसल दुखदायी नहीं थी। क्योंकि शाहजहाँ के ऐशो आराम का यहाँ पूरा ध्यान रखा गया था। सिर्फ उन्हें मुसम्मन बुर्ज से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी। मुसम्मन बुर्ज से ताजमहल दिखाई देता था। इसे देखते हुए ही शाहजहाँ ने अपनी बाकी उम्र काट दी। मुसम्मन बुर्ज में ही उनकी मृत्यु हुई।
आगरा के किले के दो प्रवेश द्वार प्रसिद्ध हैं। एक ’दिल्ली गेट’ और एक ’लाहौर गेट’ जिसे आज अमर सिंह गेट के नाम से जाना जाता है। भारतीय सेना द्वारा किले के उत्तरी भाग का प्रयोग किये जाने के कारण दिल्ली गेट आम जनता के लिए बंद है। पर्यटक अमर सिंह गेट से ही प्रवेश करते हैं। किले के प्रवेश द्वार पर कभी भव्यता के साथ राजाओं और शाही मेहमानों का स्वागत हुआ करता था। गुलाब जल छिड़कना और वाद्ययंत्रों की ध्वनि से आगमन का क्षण ऐश्वर्य से भर उठता था। सुरक्षा का प्रबंध भी जबरदस्त था। दुश्मन अगर किसी भी तरह किले तक पहुँच भी जाए तो दीवारों से गर्म तेल की नदी सी बहाने की व्यवस्था थी। ताकि दुश्मन आगे न बढ़ पाए। किला जिस जलाशय से घिरा है वहाँ कभी सुरक्षा के लिए मगरमच्छ हुआ करते थे। उसके बाद के हरे भरे इलाके में जंगली जानवर और किले के दीवार पर तैनात सैनिक इस सुरक्षा व्यवस्था के अंग हुआ करते थे।
कांच के टुकड़ों से सुसज्जित शीश महल, आलीशान मयूरी सिंहासन, सफेद पत्थर से बना खास महल, मीना मस्जिद, नगीना मस्जिद सम्राटों के जीवन के विलासिता प्रधान पहलू को पेश करते हैं। इस किले के सारे कीमती असबाब आज गायब हैं। महलों के दीवारों से ब्रिटिशों द्वारा लिए गए मणियों की जगह आज खाली है। उनके कभी होने के निशान आज घाव जैसे दिखते हैं।
मुगल सल्तनत की बराबरी की सल्तनत न होने के कारण इस सल्तनत की बेटियाँ जहाँनारा और रौशनारा कुंवारी ही रह गईं। उनके लिए लालकिले में डोली के आकार के दो संगमरमर से बने महल हैं। इन्हें देखते हुए सहज ही यह बात मन में आई कि ये ऐसी दो आलीशान और जमीन से सटी डोलियाँ हैं जो कभी इस महल से बाहर निकल ही नहीं पाईं। आगरा का किला एक ओर शाही हमाम से लेकर अंगूरी बाग तक गूँजते शाहजहाँ और मुमताज के विलास प्रधान प्रेम के किस्सों का गवाह है तो दूसरी ओर औरंगजेब के द्वारा अपने भाइयों शुजा, दाराशिकोह का कत्ल करने की घटना का भी साक्षी है। आत्मा की आँखों से देखो तो विलासिता, प्रेम, सिसकियाँ, कत्ल, षड़यंत्र, भय, लुटा हुआ ऐश्वर्य मिलकर यहाँ की हवाओं में अजीब-सा शोर भर देते हैं। फतेहपुर के किले की हवाओं में जो खुशनुमा सुगंध थी वह सुगंध आगरा के लाल किले में एक सिरे से गायब थी।
शाम को गतिमान एक्सप्रेस से दिल्ली लौटने की घड़ी आखिर आ ही गई। अब तक आगरा में हम अकबर और उनके बाद की पीढ़ी के सम्राटों के जीवन, की कहानियों को स्मारकों के बहाने से देख समझ रहे थे। अब दिल्ली के पुराने किले में हुमायूँ के जीवन से जुड़ी कहानी को महसूस करने का पल हाज़िर था।
पुराना किला एक ऐसी अनोखी जगह है जहाँ पांडवों से लेकर मुगल साम्राज्य के सम्राट तक ने अपना डेरा डाला। महाभारत में जिस इन्द्रप्रस्थ नगरी का नाम मिलता है वह पुराने किले के भीतर ही स्थित था। जिन जगहों को हम बागपत, तिलपत, सोनीपत, पानीपत के नाम से जानते हैं ये वही जगह थे जिन्हें पांडवों ने कौरवों से मांगा था। यहाँ खुदाई से जो भूरे रंग के पात्र मिले हैं वैसे ही पात्र हस्तिनापुर की खुदाई के दौरान और पुराने किले में खुदाई के दौरान भी मिले। पुरातात्विक खोज ये बताते हैं कि इन्द्रप्रस्थ में लोगों का बसना तकरीबन 1000 ई.पू. से शुरू हुआ था। यही वह जगह है जहाँ कलिंजर और चुनार को जीतने के बाद हुमायूँ ने दीनापनाह शहर बनाया था। फिर शेरशाह ने इसे तोड़कर यहाँ एक दुर्ग बनवाया। शेरशाह दुर्ग को पूरा नहीं कर पाया। इसे जीतने के बाद हुमायूँ ने ही आखिरकार पूरा करवाया। शेरशाह द्वारा बनवाया गया क्वाल-आई-कुहना मस्जिद आज भी यहाँ मौजूद है।
शेरशाह ने मनोरंजन के लिए दुमंजिला इमारत बनाई थी। जिसे शेर मंडल कहा जाता है। इसे हुमायूँ ने बाद में अपना पुस्तकालय बना लिया। अकबरनामा में इस बात का जिक्र मिलता है कि हुमायूँ सन् 1555 में इस पुस्तकालय में शाम को शुक्र ग्रह देखने आए थे। और यहीं से पैर फिसलकर गिर जाने के कुछ ही दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई।
पुराने किले में पुरातात्विक खनन के कार्य के दौरान मौर्य साम्राज्य के समय के भी सामान मिले हैं। इस कार्य के दौरान यह भी पाया गया कि पुराने टूटे फूटे मकानों के मलबे के ऊपर ही नए घर बना लिए गए थे। एक मटके में कपड़े से बँधे हुए बीस सिक्के मिले जो राजपूत और सुल्तान वंश के साम्राज्य के थे। इसके अलावा इल्तुतमिश, बलबन, अलाउद्दीन खिलजी, फिरोज शाह तुगलक के समय के भी सिक्के यहाँ खुदाई के दौरान मिले। इस लिहाज से देखें तो पुराने किले की मिट्टी पांडवों से लेकर मुगल साम्राज्य के शासकों के कार्यकलापों की साक्षी है।
राजशाही से जुड़े स्मारकों को देखने का मंजर समाप्त हो गया था। अब हम शान्ति और अमन की निशानियों को देखने के सफर पर चल पड़े थे। इस सफर में पहला मुकाम था राजघाट। महात्मा गांधी की अहिंसा और शान्तिप्रियता की छाप यहाँ की हवाओं में महसूस की जा सकती है। दूर तक फैला हरा सुनियोजित मैदान और सुसज्जित समाधि स्थल मानो मन को घड़ी भर बैठकर शान्त कर लेने का न्यौता दे रहा था। समाधि स्थल तक पहुँचने से पहले दीवारों पर लिखे गांधी जी के वचन जैसे मन को शान्ति जल से भर रहे थे। राजघाट से निकलकर हम गाँधी स्मृति भवन की ओर निकल पड़े। गाँधी जी के जीवन के आदर्श, उनका रहन सहन, उनके द्वारा किए गए तमाम कार्यों और उनके द्वारा इस्तेमाल की गई वस्तुओं की प्रदर्शनी ने मन में स्वाधीनता आंदोलन के दौरान भारत के हकीकत का ज्वलंत चित्र खींच दिया। यहाँ से राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, तीन मूर्ति, इंडिया गेट को गाड़ी से ही देखते हुए हम अक्षरधाम मंदिर पहुँचे।
अक्षरधाम के स्वामी नारायण मंदिर में आगंतुकों को दार्शनिक स्तर पर मन की बारीकियों को समझाकर जीवन दर्शन देने की कोशिश ने मुझे आकर्षित किया। इस मन्दिर में प्रवेश करने के लिए ’दस द्वार’ से होकर गुजरना पड़ता है। ये दस द्वार दसों दिशाओं से शुभकामनाओं के आगमन का प्रतीक है। जो मन और हृदय को खोलकर आत्मा में विश्व प्रेम, भाईचारा और शान्ति का भाव भरने की प्रेरणा देता है। दस द्वार के बाद भक्ति द्वार से गुजरते हुए द्वार पर नक्काशी से बनाई गई भक्त और भगवान की दो सौ आठ जोड़ी आकृतियाँ दिखती हैं। यह द्वार आगन्तुकों को आशीर्वाद देने का सूचक है। इस द्वार को पार करके हम भव्य हॉल घर में पहुँचे। इसे दर्शनार्थी केन्द्र कहा जा है। यहाँ स्वामी नारायण जी के संदेश और उनकी मूर्तियाँ हैं।
भारतीय संस्कृति में मोर सौंदर्य और आत्मनियंत्रण का प्रतीक है। भारत के राष्ट्रीय पक्षी मोर से जुड़ी कई दिव्य कहानियाँ हिन्दू शास्त्र में मिलती हैं। इसी सत्य के आधार पर अक्षरधाम के मयूर द्वार बने हैं। दो मयूर द्वारों में 869 मोर जड़ाऊ पत्थर के साथ खुदे हुए हैं। और दो मयूर द्वारों के बीच स्वामीनारायण जी का चरणारविंद है। जो पृथ्वी पर उनके अवतरण का सूचक है। इस चरणार्विंद पर चार शंखों का जल गिर रहा है। चरणार्विंद के बाईं तरफ भारत उपवन है। जहाँ हिंदू शास्त्र में प्राप्त कहानियों से जुड़ी मूर्तियाँ बनी हैं। साथ ही मूर्तियों में निहितार्थ को समझाने के लिए कैसेट के जरिए कहानी भी सुनाई जा रही है। भारत उपवन के अलावा एक और उपवन है योगी हृदय कमल, जहाँ कमल के आकार के उपवन में बच्चों के लिए झूले लगे हुए हैं।
अक्षरधाम की तीन प्रदर्शनियों ने मन को गहराई से छू लिया। दृश्य श्रव्य माध्यम, बोलती मूर्तियों को देखते हुए एक निर्देशानुसार उत्तरोत्तर एक के बाद एक कक्ष से गुज़रना एक अनोखा अनुभव था। इस प्रदर्शनी को सहजानन्द प्रदर्शनी कहते हैं। इसका लक्ष्य है न्यायपूर्ण, अहिंसात्मक, शाकाहारी, नैतिकता और सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देना। अगली प्रदर्शनी में एक विशाल चित्रपट पर नीलकंठ यात्रा फिल्म प्रस्तुत की जाती है। चित्रपट लगभग छह मंजिला मकान जितना था। बाल योगी नीलकंठ के जीवन पर आधारित इस फिल्म को देखते हुए नदी, पहाड़, झरनों और प्राकृतिक दृश्यों से हम खुद को घिरा हुआ महसूस कर रहे थे। चित्र पट की अनोखी बनावट ने मानो दर्शकों को भी नीलकंठ की यात्रा में शामिल कर लिया था।
प्रदर्शनी का तीसरा अंग था संस्कृति विहार। जो दरअसल नौका विहार है। लोगों के दल को लेकर एक मोर के आकार की नाव एक ऐसी जगह से गुजरती है जिसके दोनों ओर मूर्तियाँ हैं और इनके जरिए दस हजार वर्ष के भारत के इतिहास की छवि दर्शकों के जेहन में बैठ जाती है। वैदिक जीवन से लेकर तक्षशिला और प्राचीन युग के शिक्षण संस्थानों के अतुलनीय जीवन दर्शन, आविष्कारों या खोजों को यह बारह मिनट का नौका विहार सहजता से महसूस करवा देता है।
सूर्यास्त के बाद अक्षरधाम में आयोजित सहजानन्द जल प्रदर्शनी में प्रकाश और ध्वनि के अद्भुत प्रयोग के माध्यम से अहंकार की जगह पर सहजता लाकर जीवन में आनंद प्राप्त करने का संदेश दिया गया है। इन प्रदर्शनियों के अलावा स्वामी नारायण का मन्दिर, मन्दिर का गर्भगृह, भव्य मंडप, नीतिपरक कहानियों को आधार बनाकर मंडोवर में की गई नक्काशी दर्शकों को कई घंटों तक यहाँ बाँध कर रख सकती है। मंदिर नारायण सरोवर से घिरा है। इस सरोवर में 108 ताम्बे के गौमुखों से लगातार जल गिर रहा है। ये गौमुख 108 देवताओं के नामों के सूचक हैं। मन को घंटों बाँध कर रखने की शक्ति से सम्पन्न इस जगह में कैमरा, मोबाइल कुछ भी ले जाने की अनुमति नहीं है। खाने की भव्य दुकानें भी मन्दिर के भीतर ही हैं। एक बात यहाँ गौरतलब है कि आज के युग में लोग जहाँ मोबाइल के बिना खुद को अपाहिज सा महसूस करते हैं वहीं यह मंदिर घंटों तक लोगों को मोबाइल की दुनिया से बाहर निकलकर वक्त बिताने का निमंत्रण देता है। शांति और सौंदर्य का स्पर्श पाने की चाहत के चलते असंख्य लोग इस निमंत्रण को स्वीकार करते हुए मोबाइल की दुनिया से बाहर निकलकर यहाँ घंटों वक्त भी बिताते हैं। हमने तीन बजे मन्दिर प्रांगण में प्रवेश किया था और कैसे रात के आठ बज गए पता ही नहीं चला। अक्षरधाम से निकलकर हम अतिथि गेस्ट हाउस की ओर रवाना हुए और वहाँ पहुँचकर लगभग चार दिनों के बाद घर जैसे भोजन का सेवन करने का मौका मिला।
अगले दिन दोपहर को हमें दिल्ली हवाई अड्डा पहुँचना था। सुबह होते ही हम सैर पर निकल पड़े। और टहलते हुए दिल्ली के चित्तरंजन पार्क के मंदिर में पहुँचे। मंदिर का वातावरण बेहद शांतिपूर्ण था। यहाँ से हम दिल्ली का कमल मन्दिर अर्थात् लोटस टेम्पल देखने निकल पड़े। यह बहाई उपासना मंदिर है। बहाउल्लाह के संपूर्ण मानव जाति को अपनाने और पृथ्वी को एक देश मानने का विश्वास इस मंदिर की नींव है। कमल मंदिर पानी के नौ बड़े तालाबों से घिरा है। नीले रंग का प्रतीत होने वाला जल आँखों को अजीब सी ठंडक देता है। साथ ही यह मंदिर के अन्दर के तापमान को भी कम रखता है। भारतीय उपमहाद्वीप में विश्व के विभिन्न भागों में बने सात बहाई मन्दिरों में से यह एक है। कमल का फूल भारतीय संस्कृति में चैतन्य, ज्ञान, सौन्दर्य का प्रतीक रहा है। कमल के फूल के आकार का यह श्वेत धवल मंदिर नौ तालाबों के ऊपर बना है। मानो पानी में खिला श्वेत कमल हो। विशाल उपासना गृह में एक साथ तेरह सौ लोग बैठकर उपासना कर सकते हैं। इस मंदिर में कमल की कुल सत्ताइस पंखुड़ियाँ हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से भी इस मंदिर का उपासना गृह ध्यान के उपयुक्त है। क्योंकि कहा जाता है कि अगर इमारतों की छत कोणाकार हो तो विद्युत चुम्बकीय किरणों का अनोखा प्रवाह उस छत के नीचे बैठने वालों को शान्ति की अनोखी अनुभूति दे सकता है। इसी वैज्ञानिक सत्य के चलते ही प्राचीन काल से मन्दिर की छत कोणाकार बनाने की रीत चल पड़ी। गिरजाघरों और मस्जिदों के छतों के भी सपाट न होने के पीछे संभवत: यही वैज्ञानिक सत्य हो सकता है। जो भी हो कुल मिलाकर दूर तक फैले हरे मैदान के बीच नौ तालाबों से घिरा कमल के आकार का मंदिर हमें शान्ति से भर गया।
कलकत्ता वापस लौटने का पल हाजिर था। हम अपने साथ आगरा का मशहूर पेठा और स्मृति चिह्न के तौर पर फतेहपुर सीकरी से खरीदी गई संगमरमर पर नक्काशी के दो नमूने एक ताजमहल और दूसरा मोमबत्ती रखने का आधार लेकर जा रहे थे। हवाई जहाज हमें कलकत्ता ले जा रही थी। लेकिन मन अब भी इतिहास की गलियों और शान्ति और अमन के प्रतीक मंदिरों की गलियों में घूम रहा था।