विज्ञान में उपनिवेशवाद और पितृसत्तात्मकता

एक समाज की विज्ञान संबंधी सोच उस समाज की खुशहाली, समृद्धि, प्रगतिशीलता को गहराई से प्रभावित करती है। भारत के प्राचीन शास्त्रों में विज्ञान को विशिष्ट के ज्ञान के अर्थ में देखा गया है। वहाँ निरंतर अभ्यास के जरिए चेतना को विज्ञानमय कोश में ले जाने की बात मिलती है ताकि जगत का विशिष्ट ज्ञान मिल सके। इस ज्ञान के आलोक में जीया जाने वाला जीवन सामंजस्यपूर्ण होने के साथ-साथ सामाजिक खुशहाली, समृद्धि और गतिशीलता का कारण भी बनता है। प्राचीन काल में विज्ञानसम्मत जीवन जीने वाले योगियों के लिए प्रयोगशाला की भूमिका संपूर्ण ब्रह्मांड अदा करती थी और इंसान की आत्मचेतना पर प्रयोग होते थे। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि विज्ञान का वह दौर अब नहीं रहा। इस दौर में केवल भारत में ही नहीं दूसरे देशों में विज्ञान को दर्शन से ही जोड़कर देखा जाता था। तब विज्ञान और दर्शन में विच्छेद नहीं था। विज्ञान को प्राकृतिक दर्शन (Natural Philosophy) के नाम से जाना जाता था। यहाँ तक कि न्यूटन द्वारा प्रस्तुत विज्ञान के प्रथम गणितीय सूत्रीकरण को भी आधुनिक अर्थ में आज भी प्रकृति विज्ञान के गणितीय सिद्धांत (Mathemetical Principles of Natural Philosophy) कहा जाता है।
वर्तमान दौर में विज्ञान को भौतिक जगत का व्यवस्थित ज्ञान प्रस्तुत करने वाला विषय माना जाता है। प्रयोगशालाओं में वस्तुओं पर आधारित प्रयोगों के जरिए इसके अधिकतर सिद्धांत निर्मित किए जाते हैं। यह विज्ञान तकनीक से संबद्ध है और प्रकृति पर काबू पाने का उद्देश्य रखता है। फ्रांसिस बेकॉन ने वैज्ञानिकों के इस रवैये को एक रूपक के जरिए पेश किया है। प्रकृति मानो एक स्त्री है और वैज्ञानिक उसका राज़ जानने के लिए उसका शोषण करते हैं। विज्ञान का यह रवैया रहस्योद्घाटन नहीं प्रकृति का बलात्कार करता है। शूमाकर ने इसे कार्यसाधन और शोषण का विज्ञान कहा है, जो नैतिक चेतना सम्पन्न विज्ञान से भिन्न है।
दरअसल यूरोपीय नजरिए के प्रभाव के चलते आधुनिक विज्ञान से प्रकृति और दर्शन से तालमेल बैठाकर आगे बढ़ने की मानसिकता गायब हो गई है। प्रयोगों का विषय, ढंग, पद्धति सब पर यह नजरिया काबिज है। इसे वैज्ञानिक उपनिवेशवाद (Scientific colonization) कहा जा सकता है। गौर करें कि सामाजिक क्षेत्र में एक साथ कई नजरिए जिन्दा हैं पर विज्ञान की जमीन को यूरोप जैसे निगल गया है। इतना ही नहीं कार्यसाधन का विज्ञान वैज्ञानिकों का ईमान भी बिगाड़ता है। निरीह जानवरों को पकड़कर उन्हें जहरीली दवाई देना आँखों में रासायनिक पदार्थ डालकर प्रयोग करना उनका शोषण है। वैज्ञानिकों की नैतिक चेतना अगर अनुदान पाने की वजह से इस काम को करने की इजाजत दे दे तो यह ईमान का बिगड़ना ही तो कहलाएगा। किसी वस्तु या पदार्थ की प्रवृत्ति को समझने के और भी कई वैज्ञानिक तरीके हो सकते हैं। ऐसे तरीके जो जीवों के शोषण पर आधारित न हो। लेकिन विज्ञान की गलियों से नैतिकता का वह आलोक ही मानो एक सिरे से गायब है जो इस तरह के शोषण को गुनाह माने। फ्रिटजॉफ कापरा जैसे वैज्ञानिकों ने विज्ञान में नैतिकता के स्खलन के सावल को रेखांकित किया है। यह गौर करने वाली बात है कि जब कार्य साधन के लिए जानवरों के शोषण को खुलेआम स्वीकृति मिली हुई है तो समाज में भी कार्य साधन के लिए शोषण की मानसिकता को स्वीकृति मिलना स्वाभाविक है। क्योंकि विचार, मानसिकता, सोच समाज में प्रकाश की गति से फैलने की ताकत रखते हैं। प्रकाश की गति में छिपे इस रहस्य को समझने के लिए ‘ईथर’ की अवधारणा को समझना जरूरी है। हालांकि पदार्थ विज्ञान में ‘ईथर’ की अवधारणा अब पीछे छूट चुकी है, लेकिन इसके बदले में क्वांटम की जो अवधारणा सामने आई है वह शोषण पर आधारित विज्ञान को कड़ी चुनौती दे चुकी है। क्वांटम विज्ञान से प्रकृति की कई ऐसी बातें सामने आई हैं जिसके बारे में वैज्ञानिक उपनिवेशवाद से प्रभावित वैज्ञानिक कुछ भी नहीं कहते। न ही उसे नकारने का वाजिब तर्क दे पाते हैं। प्रकृति का जो सत्य क्वांटम विज्ञान सामने रख रहा है उसका इंसानों द्वारा बनाई गई प्रयोगशाला में निरीक्षण करके उससे संबंधित सिद्धांत बनाना या उसे सत्यापित करके सूत्रों में अटाना असंभव है। लेकिन ऐसे तत्वों का अस्तित्व प्रकृति में है, इस बात को झुठलाना असंभव है। इसे प्रकृति की मार कहें तो गलत नहीं होगा। प्रयोगों से सत्यापित विषयों को ही वैज्ञानिक सत्य का दर्जा देने वाले वैज्ञानिकों के लिए आगे कुँआ तो पीछे खाई जैसी स्थिति है। विज्ञान के आकाश में समय का यह दौर सन् 1920 के आसपास शुरू हुआ। ‘ईथर’ की बात से इस दौर को समझने की कोशिश की जा सकती है।
‘ईथर’ का सवाल प्रकाश से जुड़ा है। इस सवाल ने वैज्ञानिकों को अधुनातन पदार्थ विज्ञान के चौखट पर लाकर खड़ा कर दिया। 19वीं सदी में माइकल फाराडे और क्लर्क मैक्सवेल ने विद्युत चुम्बकीय सिद्धांत का विकास किया, जिसके चलते बाद में यह आविष्कृत हुआ कि प्रकाश में विद्युत और चुम्बकीय क्षेत्र में तेजी से परिवर्तित होने की क्षमता है। यह क्षेत्र अंतरिक्ष में लहरों की तरह प्रसारित हो सकता है। इन क्षेत्रों की सत्ता यांत्रिक नहीं है। मैक्सवेल के समीकरण ने पहली बार ऐसा कोई सिद्धांत सामने रखा, जिसने न्यूटन की यांत्रिकता की अवधारणा को चुनौती दी। इस आविष्कार के साथ ही मैक्सवेल मुश्किल में फँसे। सवाल उठा कि अगर प्रकाश में विद्युत चुम्बकीय लहरें हैं तो वह शून्य में कैसे प्रवाहित हो सकती है? उसे प्रवाहित होने के लिए वायु जैसे किसी माध्यम की तो जरूरत होगी ही? इस सवाल ने ‘ईथर’ का आविष्कार किया। वैज्ञानिकों ने कहा कि भले ही वायु न हो पर अदृश्य माध्यम अंतरिक्ष में है। इसे उन्होंने ‘ईथर’ कहा। प्रकाश की लहरें इसी से गुजरती हैं। ईथर के वैशिष्ट्यों के बारे में भले ही जानकारी तब तक नहीं मिली थी, फिर भी 20वीं सदी के शुरुआती दौर के वैज्ञानिक इस बात को नकार नहीं पाए, क्योंकि उनके दिमाग में लहरों के किसी माध्यम के जरिए बहने का एक यांत्रिक चित्र बैठा हुआ था। इस चित्र के तहत एक बात से वे सहमत थे कि लहरों को प्रवाहित होने में मदद करने वाला कोई न कोई माध्यम तो होना ही होगा। यह दरअसल उनके सोच की सीमा थी। इस सीमा का एहसास तब हुआ जब आइन्सटाइन ने यह आविष्कृत किया कि प्रकाश को बहने के लिए किसी माध्यम की जरूरत नहीं पड़ती। क्योंकि यह लहरों और कणों दोनों रूपों में खुद को व्यक्त करता है। यह कण शून्य में भी बह सकते हैं। उन्होंने प्रकाश के इन कणों को क्वांटा कहा। जो क्वांटम सिद्धांत के नामकरण का भी कारण बना। प्रकाश के इन कणों को आज फोटोन कहा जाता है। यह सत्य सामने आते ही ‘ईथर’ के अवधारणा की जरूरत खत्म हो गई। इस तरह विज्ञान ने एक नये दौर में कदम रखा। किंतु समाज में विज्ञान के इस नए दौर के प्रति जागरूकता नहीं दिखती। क्योंकि आज भी प्रयोगों से साबित बात को ही सत्य मानने की जिद्द से चिपटे रहने वाले वैज्ञानिकों की संख्या ही अधिक है। उस पर यूरोप के वैज्ञानिक उपनिवेशवाद का प्रभाव भी कुछ कम नहीं है जो विज्ञान को प्रकृति और दर्शन से जोड़ने के बजाय वस्तु और प्रयोग से चिपकाकर रखना चाहता है और प्रकृति पर नियंत्रण हासिल करना चाहता है। अनुदान भी इसी तरह के शोध के लिए दिए जाते हैं। यहाँ विज्ञान की आत्मा को पूंजी नियंत्रित कर रही है और वैज्ञानिकों की ऊर्जा ब्रह्मांडीय शक्ति को शिशु सुलभ जिज्ञासा से प्रेरित होकर जानने के नए-नए रास्ते खोजने के बजाय प्रयोगशालाओं में विधिवत शोध में फँसकर नष्ट होती जा रही है।
वैज्ञानिक संकट के इस दौर में फ्रिटजॉफ कापरा जैसे वैज्ञानिक प्रकृति के शोषण के वैज्ञानिक रवैये का एक सिरे से विरोध करते हैं। उनका कहना है कि पितृसत्तात्मक मानसिकता से विज्ञान को मुक्त करना जरूरी है। वे ऐसे विज्ञान का उत्थान देखने की चाहत व्यक्त करते हैं जहाँ वैज्ञानिक, प्रकृति का सहयोगी बनकर प्राकृतिक घटनाओं को जानने समझने और ज्ञान हासिल करने की राह पर चलेगा और प्रकृति के विधानों से बँधकर विज्ञान को समृद्ध करेगा। ऐसे विज्ञान के प्रसार के लिए निश्चित रूप से कठिन आत्मबल की जरूरत है। वैज्ञानिक उपनिवेशवाद और विज्ञान के क्षेत्र में जमकर बैठे पितृसत्तात्मक मूल्यों से लड़ना इतना आसान नहीं है। ये मूल्य प्रकृति का एक स्त्री की तरह शोषण करते हैं।
मानव शरीर एक ऐसा उपकरण है जिसका विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र होता है। इस क्षेत्र में फोटोन का होना तो स्वाभाविक है। यह फोटोन अंतरिक्ष में प्रवाहित होने की ताकत रखते हैं। मानव के प्राण या फिर उसकी आत्मा मानव के शरीर का विद्युत है। उसी से शरीर में ताप रहता है। इसलिए उसके शरीर से निकलते ही शरीर ठंडा पड़ जाता है। इस लिहाज से देखें तो आत्मा एक शक्ति हुई। ऐसी शक्ति जिसकी परिभाषा विद्यालयों के विज्ञान की किताबों में नहीं मिलती। मिलेगी भी कैसे? इसे निकालकर मेज पर रखकर प्रयोगशाला में प्रयोग करना भी तो संभव नहीं है। और जो प्रयोगों के जरिए साबित नहीं होगा उसे वस्तुवादी वैज्ञानिक मानेगा नहीं। वह भले ही आत्मा के सवाल से मुकर जाए पर इस बात का जवाब उसके पास नहीं है कि विचार भले ही शब्दों के जरिए हवा में बहकर दूसरे के कानों से दिमाग तक पहुँच जाए पर ये लगातार घनीभूत होकर संस्कृति को कैसे बदल देते हैं? इस बात का जवाब पाने के लिए आत्मा की शक्ति पर प्रकृति के विधान का अनुसरण करते हुए शोध करना जरूरी है। आत्मा की शक्ति विचारों में घनीभूत होती है। विचारों और शरीर के विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र के परस्पर संबंध को जानना जरूरी है। इच्छाशक्ति पर भी इसी लहजे से शोध करना आवश्यक है। वर्तमान दौर में उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद भी विद्यार्थी डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। यह आत्मा का मर्ज है। और उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद भी इस मर्ज का शिकार होना यह साबित करता है कि वर्तमान शिक्षा आत्मा के मांग की पूर्ति नहीं कर पा रही। नैतिकता का अभाव, भ्रष्टाचार, डर, आतंक सब आत्मा के मर्ज के ही लक्षण हैं। भारत एक ऐसा देश है जहाँ योगियों ने सूर्यविज्ञान, चंद्रविज्ञान, वायुविज्ञान जैसे विभिन्न विज्ञान के ज्ञान से स्वयं को समृद्ध किया है। सूर्य की ध्वंसात्मक तथा सृजनात्मक किरणों को अलग-अलग कर आत्मबल से वस्तु का रूपांतरण तक ये योगी कर सकते थे। यह कोई जादू नहीं था। यह तो सूर्य विज्ञान और आत्मा के प्रभाव से निकलने वाले लहरों या कणों के ज्ञान के आधार पर विकसित कौशल का प्रमाण था। विशुद्धानंद परमहंस द्वारा इस तरह वस्तु के रूपांतरण की बात गोपीनाथ कविराज की पुस्तक ‘सूर्यविज्ञान’ में मिलती है। काशी में स्वयं विशुद्धानंद परमहंस द्वारा निर्मित विशुद्ध कानन आश्रम में विज्ञान मंदिर स्थापित है। उस मंदिर में सूर्य की किरणों का प्रयोग करके वस्तु का रूप बदलने वाला सूर्य लेंस नहीं है। इसे वहाँ स्थापित करने की इजाजत विशुद्धानन्द जी को ज्ञानगंज से नहीं मिली।
तिब्बत में स्थित ज्ञानगंज एक ऐसी जगह जो विद्युत चुम्बकीय शक्तियों से घिरा है। इसलिए वह सैटेलाइट की पकड़ में भी नहीं आता। सूर्यविज्ञान, चंद्रविज्ञान, वायुविज्ञान जैसे तमाम विज्ञानों का ज्ञान हासिल करने के लिए उत्कृष्ट प्रयोगशालाएँ यहाँ मौजूद हैं। लेकिन ये योगियों के प्रशिक्षण की जगह है। आत्मशक्ति के बगैर इस साम्राज्य में प्रवेश करना असंभव है। क्योंकि तीसरे आयाम में फँसी चेतना को यहाँ पहुँचने का प्रवेश द्वारा दिखता ही नहीं। लेकिन इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि इस जगह का अस्तित्व है। ऑलकॉट की जीवनी ‘ओल्ड डायरी लीव्स’, विमल दे का ग्रंथ ‘कोईलाशे महातीर्थों’, गोपीनाथ कविराज के ग्रंथ ‘सूर्यविज्ञान’ और ‘ज्ञानगंज’ में जो इस जगह को देख आएँ हैं उनका आँखों देखा वर्णन है। विशुद्धानंद परमहंस का जीवन स्वयं इसका प्रमाण है। इस व्यक्ति की अद्भुत शक्तियों का समय और समाज साक्षी है। इस बात को ठीक से समझने की जरूरत है कि ये योगी वैज्ञानिक थे। इन्होंने ब्रह्मांड की शक्तियों और आत्मा शक्ति के विविध पहलुओं को जानकर स्वयं को समृद्ध किया था। तब विज्ञान को प्राकृतिक दर्शन कहने का दौर भी समाप्त हो गया था। वैज्ञानिक उपनिवेशवाद और यूरोपीय मानसिकता ने विज्ञान पर ऐसा मंत्र फूका कि वह प्रकृति और ब्रह्मांड से कटकर वस्तु से चिपट गया और शाखाओं में विभक्त होने के साथ-साथ खण्डों में बँटते-बँटते मैकरो से नैनो तक पहुँच गया। अब आलम ये है कि तकनीकी समृद्धि तो है लेकिन इंसान आत्मा की शक्ति के अभाव में डिप्रेशन, डर, आतंक, तनाव, भ्रष्टाचार जैसे तमाम मर्जों के शिकार हैं। धर्म के क्षेत्र में ढोंगी योगियों, और प्रवचनों के जरिए धन कमाने वालों, अंधविश्वास फैलाने वालों और ठगों की जमघट है। हॉरर फिल्मों की वजह से आत्मा की अवधारणा ही बिगड़ गई है। विज्ञान के क्षेत्र की इस शक्तिशाली अवधारणा के विस्थापन के कारण पूरा विश्व शान्ति के अभाव में तरस रहा है। लेकिन कोई यह समझना भी नहीं चाहता कि शान्ति की जगह भी तो आत्मा में ही है। विज्ञानसम्मत ढंग से आत्मा पर विचार करके उसे समझे बगैर शान्ति कैसे स्थापित होगी? आत्मा ही तो शान्ति का आसन है। आत्मा की विकृति जब भयानक स्तर तक पहुँच जाती है तब उसके लक्षण भौतिक जगत में समस्याओं के रूप में दिखाई देने लगते हैं। युद्ध, हिंसा, भ्रष्टाचार इसी के प्रकाशित रूप हैं। वैदिक साहित्य में प्रकाशित आत्मा के वैज्ञानिक सत्य पर पौराणिक युग में देवी देवताओं के कहानियों का आवरण पड़ गया। समय ने कुछ ऐसी करवट बदली कि देव देवियों की कहानियाँ ही रह गईं और विज्ञान से उसका नाता टूट गया। अंधविश्वासों और अतार्किक रीतिरिवाजों ने सामाजिक जीवन में जड़ें जमा ली। अंग्रेजों ने ऐसी मानसिकता देखकर कार्य साधन और स्वार्थसिद्धि के लिए भारतीयों को गँवार कहकर खुद को भारतीयों का उद्धार करने वाली कौम के रूप में प्रतिष्ठित किया। भारतीयों में भी अपनी विरासत के महत्व को समझने की चेतना नहीं थी और विज्ञान की ऐसी अमूल्य धरोहर हाथों से फिसल गई। वर्तमान दौर में वस्तुवादी विज्ञान का बोलबाला है। आत्मा की ऊर्जा पर वैज्ञानिक ढंग से प्रयोग नहीं हो पाया तभी इस ऊर्जा के बारे में समाज में कोई जानकारी ही नहीं मिलती। आत्मा की अवधारणा पर सदियों से धूल जमती गई है। तभी आत्मा के सवाल पर बात करने वालों पर अंधविश्वासी या फिर अतार्किक या ईश्वरवादी होने का तमगा लगा दिया जाता है। इसका रिश्ता विज्ञान से है इसे कोई मानना ही नहीं चाहता और न ही इस बात को समझना चाहता है कि आत्मा की शक्ति है चेतना। इसे भारतीय दर्शन में प्राप्त पंचकोश की अवधारणा के तहत अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और फिर आनंदमय कोश तक ले जाना ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है। इस लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ने वालों के लिए किसी भी क्षेत्र में भली भाँति प्रतिष्ठित होना बहुत आसान हो जाता है। आत्मा के प्रश्न को इंसान की सोच से बाहर निकालकर किसी भी कीमत पर सफलता हासिल करने का जो जुमला समाज में उछाला जाता है, वही शान्तिपूर्ण जीवन और समाज के सपने को राक्षस की तरह निगल रहा है। आज बरसों बाद क्वांटम विज्ञान पर काम कर रहे वैज्ञानिक भारतीय दर्शन के साथ क्वांटम विज्ञान में उद्घाटित सत्य का साम्य देख पा रहे हैं। इस सत्य के आलोक में पूर्व और पश्चिम का सारा भेद भाव भूलकर मानवता को समृद्ध करने की ताकत रखने वाले विज्ञान को समाज में प्रतिष्ठित करने के लिए सचेष्ट होना बुद्धिजीवियों का दायित्व है।

Pictures courtsey: Google Images
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